वाल्माक के एतिहासिक राम

विश्वनाथ लिमये

सत्साहित्य प्रकाशन, दिल्‍ली

(है विष्वताए नियये. ६६७

भध्करण ६८७

प्रकाशवा सत्सीहियय प्रदान २०४-दी चावड़ी वाजार, दिल्‍ली-१६०००६

मद्क संजय पिटस, मानसरोबर पाक, शाहदण, दिती-११००३२

युनमद्रण.. प्राफ्कि वल्ड आफसट प्रैस ४६५६ कूचा दखिनीराय, दरियागज, नई दिल्‍नी-१६१०००२

मूल्य > पुस्तकालय सत्यरण रू० ३४०० स्परवैक फ्क---क०

२87१४॥ %छ 28985 ए#/श॥ ४४7४४? #छा एव 0५ शाझीफभावदी (9/6

शि॥7४ 0: 00५ ९३४०0 छ& 3500 रिक्शा 86॥ ६०॥॥0॥ 228 >४5 00

ऊँ श्री रामाय तस्में नमः

इक्ष्वाकु वंश प्रभवी रामो नाम जने श्रुति

वियतात्मा महावीर यूतिमान घृतिमाव वशी 8११४६ प्रभंत सत्यप्तंधरच प्रभानाच हितेरत

पशरबी ज्ञायसपत्न शुनिवंदय समाधिमात्‌ ॥११११३ रक्षिता स्वस्पधर्मत्म स्वजनस्यच रक्षिता

बेंदवेदाग तत्त्वत्तो. धनुर्वेदश्च॒ निष्ठित ॥!११४

इद्षवादु वश में उत्पन एक ऐसे प्रुष हैं जी लोगो में राम के नाम से विश्यात हैं। वे मन को वश मे रखनेवाले, महाबलवान, कातिमान, घयवान और जितेद्रिय हैं वे धर्म के ज्ञाता, सत्यप्रतिन्न, प्रजा के हित साधन में रत, यशस्वरी, पवित्र, ज्ञानी और मत की एकाग्र रखनेवाले हैं। वे वेदबेदाग तथा तत्व के जानकार तथा धनुर्वेद मे निपुण हैं। ने स्वम के धर्म की रक्षा करते हैं और स्व॒जनो के धर्म की भी रक्षा करने

वाले हैं।

अमेस कर्मण, भगवान परमेद्वर: प्रीयताम ने मस पुत्तक रूपी यह कर्म एवं प्रेरणा परमेश्वर की है मेरा रुछ नहीं

जिनकी अखड-क्ृपा तथा अनवरत स्नेह के कारण मेरा जीवन सार्थक होने की सभावना बनी है उन स्व० पृज्यश्री डाँ० हेइगेदार

एवम्‌

स्व० पृज्यश्री गुरुजी

के पावव चरणों में यह्‌

पुष्पाजलि

श्री ।।

(अपंण, रामापंणमस्तु, अनुक्रमणिका )

स्वागत ,

द्वितीय सस्करण की भूमिका

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

>पसंरसंघ चालक श्री गुएजी

पू० प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी का भाशीर्वाद प्रत्तावना

आलोक-१ रामकथा की ऐतिहासिकता किरण-१ श्री रामचन्द्र का ऐतिहासिक व्यवितत्व वाल्मीकि उपसहार आलोक-२ अवतार-परम्परा किरण-१ मत्स्मावतार कूर्मावतार हे वराह अवतार नरसिह अवतार वबामनावतार परशुराम उपसहार भालोक-३ सूयंवंश किरण-१ मनु दैवस्वल इद्ष्वाकु से माधाता हे तिशंकु तथा हरिश्चद्र सगर से अशुमान्‌ दिलीप भगीरय अम्बरीष रघु दशरथ उपसंहार

है हर

ज््णां जा ज्यों

१२

१५ १५

२० २१ २३ रड

३३ शेर ३६ ३६ हर 5]

भ१ भर |्छ ६१

आोक-४ वालकाण्ड द्ट्ड

किरण-१ रामजन्म के पुर्व की स्थिति द्ट्ड रामजम्म नथा शिक्षण द्द्फि

बसिष्ठ और विश्वामित् छ्र

4 विश्वामित्न के साथ प्रस्थाच छू

ताइकावद से सिद्धाअतत छ्फ

मिथिला की ओर

सीता-समाह्चुय ्ो

परशुराम का गरवे-भग | उपभ्हार ६१ आलोक-४ अयोध्याकाण्ड ह्च किरण-१ अयाध्या ह्ड कैकेयी और मधरा छह

रामसन्‍्य का शिलाब्यॉस १०९

कौशहया के महल में श्ण्छ

राम और छीता श्श्र

विदाई शरद

तमसा के किन्तारे १२१

मय गनेरपुर, घ्र्४

& सगम से चित्कूट श्श्द

१०७ दशरथ का देहस्याग श्श्र

११ भरते का आगमन १३४

१२ कैकेयी, भरत, कोशल्यः श्द्ष

१४ भरत की चनयात्ना १४३

श४ भरत-मिलाप च्ड७

१६४ राम राज्यापिपक श्श्य्‌ उपसहाएर श्र पृश्शिंष्ट श्द्द घढना कम तिथियां श्ध्द

क्षीराम सव॒त््‌ श्ध्

मातवकाल या मनुसवत्त श्द्ह्‌

दा० कामिल घुल्के और रामायण श्ज्जु

एक विचार १७५

&६ महंपि अरखिन्द द्वारा महाऊाव्यो की तुलना श्ड्छ

मैं अत्यधिक इत्तन्ञ हू एज

ञ्जा

स्वगत

फोडिते भाडार। धन्या वा हा माल भी तो केवल हमाल। भारवाही

अखग्ड लीलामय परमात्मस्वहूप दशरथनन्दत श्री राम की जीवन गाभा का जो रफ्तपूर्ण अद्भुत, अद्वितीय, अत्युत्तम अमर, अथाहू रतन भण्डार महँवि वाल्मीकि ने अपनी दिव्य वाणी मे लुटाया है, उप्ते अपगी अत्यन्त अल्प ग्रहण-शकवित के अनुसार मैंने भारवाही कुत्ती के रूप मे जन॑ साधारण तक पहुचाने के प्रयत्न में स्वय को केवल अधिक पित्त करने का ही प्रयास किया है। इसी प्रयास्त के अग के नाते सन्‌ ७४- ७५ में स्पैष्ठो की कृपा से मुप्ते प्रत्यक्ष विवेकानन्द गिला पर ही रेह-ठो वर्ष निवास का सौभाग्य प्राप्त हुआ था उद दियो परम वन्दनीया मोसी (स्व० लक्ष्मीयाई कैसकर, सस्यापक-सचालिका, राष्ट्रसेविका समिति) द्वार दिये बयें “टमथण प्रवचन' को पढ़ने का सौभाग्य मिला। उत्त अध्ययस रूपी बीज का ही यह तवीन बृक्ष पाठकों के सामने उभर कर आया है!

स्थ० मौसी जी का आग्रह था कि जिन्हे राम को जानना हो वे वाल्मीकिकृत रामायण अवश्य पढ़ें। उनके अनुसार मूल रामायण केवल एक बार पढने से ही उमकी बात पूर्णतया सही प्रतीत हुई काद्ी कामक्ोटि शकराचारे पृ श्यपांद जग्रेस्र सरस्वती के साथ तमिलनाडु की पदयात्ता करते-करते रामामण के अधिक अध्ययन का विचार दृढ होता गया। यात्रा से सोटने पर पू० पिताजी की अस्वस्थता में उतकी सेवा करते-करते रामायण का २-३ बार अध्ययन सभव हो सका उन दिनो कुछ उद्धरण भी तिख पाया था बाद में वतवासी वन्धुओं में काम करते-करते रामायण कासीन कुछ पुत्रों का पता चलता गया। राबी के संस्कृति विहार' के सत्थापक- संचालक श्री ओवेराय की कृपा से डा० बुल्के, पुण्य करपात्ती जी, गुरु गोविन्दर्सिह, नानाभाई भट्ट आदि के अनेक प्रसिद्ध तथा विस्तृत ग्रन्थ भी अव्ययत के लिए उप- लब्ध हो सके | थी राजगोपालाबार्य, वी० दी० एस० अय्यर की कब समायण तथा श्री निवास शास्त्री आदि के ग्रन्थ पहले हो पढ़ चुका था, अत ऋषिकेश में शिवा- तत्द आश्रम में गायत्री पुरश्चरण के साथ पतितपावती सगा के तट पर यह पविध- तम मर्यादा पुस्षोत्तम-रामस्मरण तैयार होता गया।

शाम नाम ही प्रभाववारी शक्ति के बारे में वई क्याए प्रचद्धित हैं। पहा तक कहा जाता है कि कैवल एक वार राम नाम लेने से कोटि जन्म के पाप नप्ट हो जाते

हैं हुसरी ओर स्वय वाल्मीकिजी को या देवी अहित्या को कितना भीषण तप करना पढा है। उस स्थिति से भुझ जैसा अत्पज्ञ गदि इनने प्रयास के बाद भी आवश्यक मात्रा में पावित्य का अजन क्र सका हो तो केवत तप करना और शेप है, इतना ही मैते अर्थ निकाना है। जहा तकू जप का सम्बन्ध है, 'राम' शब्द, 3 का प्रतिरूप माता जाता हे। % के उच्चारण के लिए विशेष वैज्ञानिक विधि की आवश्यकता होती ह। राम शब्द का अपढ से अप व्यवित भी मरलता से उच्चारण कर सकता है, इसीलिये राम नाम जप सर्वाधिक लोक॑प्रिय तथा प्रभावी बनता गया है। इस ग्रस्थ-जेखन के समय पर अन्य विचार भी बल पकदता गया ऋषि चारमीकि ने जिप्त मर्यादा पुरुषोत्तम मानव राम का सर्वेसाधारण के आचरण के लिये मार्गंदर्शक चरिव गाया हैं, वी आज रामभक्‍तो के लिये पुन आवश्यक प्रतीत होता हूँ। अन्य रामायणो फे मक्तिपरक वर्णनों के कारण वान्‍्मीकि के राम ढक से गये है, इगलिए उनका अप्रतिम भादवी चरित्र यथासम्भव सश्ैप में सामने लाने का पह प्रणास है। जैसी कि वात्पीकिजी ने नारद से स्वथ पूछा था और सारदणी ने उन्हें उत्तर दिया था, वसा ही लोक-शिक्षण के लिये केवल वाल्मीकिजी को ह्ठी आधार वनाकर मुख्यत राम और सीता का घरित्न पुनलिखित करने का प्रयत्न किया है। अच्य ग्रत्थों का उठलेख केवल वात्मीकिजी के निप्क्षों को पुष्ट करने माल के लिये किया है। वैसे श्रम कैसे उत्पन्न होने है, यह दिखाने के लिये भी कही-कही अन्य ग्रन्थों की सामग्री का भी उल्लेख फिसा गया है।

रामायण में कौन सा भाग प्रक्षिप्त हे तथा कौन सा मूल वाल्मीकि को है, यह नर्णय करने का अधिकार विद्वानों को ही हो सकता है, मै इसका अधिकारी नही परन्तु पूज्य करपात्नीजी की रामायण-मीमास्ा का तर्क पर्याप्त महत्वपूर्ण है जिसे सरलता से काटा नही जा सकता अयोध्याकाण्ड का प्रारम्भ निम्नलिखित श्लोक से होता है-

गच्छता मातुल कुल भरतेव तदातघ (२१११)

इस प्रकार के श्लोक या घटना सें किसो भी महानेतम ग्रत्थ का प्रारम्भ नही हो सकता | केवल वह पूर्णत सदर्धरहित हो जावेगा, अपितु बह वाल्मीकिजी की प्रतिभा का अपमान करत! होगा। वैसे ही उत्तरकाण्ड की अधिकाश जानकारों के बिना रामजीवन का महत्व एद उतका न्याय-कठोर, आत्मक्लेशकारी परन्तु जन- रेजह चरित्न अधूरा रह जावेदा। यह सभव है कि राम को अवतार मानते वाले

इन दो काण्डो को केवल इसमिद्दे प्रक्षिप्त कहे, परन्तु इन काण्डो का अवत्तार-समर्थक

भाग छोडकर भी शेष भाग रामकथा की पूर्ण जालकारी के लिये तथा काव्य की पूर्णंता के लिये आवश्यक ही है।

वाल्मीकिजी के ग्रन्थ कर बारीबो से अध्ययन करने से अनु भच होगा कि

टप

विविष्ठप-वासी देवन्ञोक भी विशिष्ट स्तरीय जीवन बिताने वाले मानवो का लोक होगा, मिनके मुखिया “इन्द्र! कहलाते थे तथा कुबेर आदि सामंत्त एवं ब्रह्मा आदि इनके मार्गदर्शक कहलाते थे। अलौकिकता माननी हो तो ये सभी नरलोक के राजा दशस्थ के अश्वमेध मे उपस्थित हुए, जहा रामजन्म के लिये एक सामूहिक चाह उत्पत्त की गयी ।दक्षिणापथ 'वानरलोक' तथा मुख्यतया लका “राक्षसलोक' था। उत्तरी भारत सत्व-प्रधान, दक्षिण भारत रजसू-प्रधान तथा राक्षस लोक तमस्‌-प्रधान लगते हैं इसी आधार पर लेखक इस निष्कर्प पर पहुचा है कि राम* रावण-सधप दो राज्यों, दो देशों, दो दिशाओ, दो जातियो, दो सस्क्ृतियो, दो पथों अपवा दो व्यक्तियों के बीच का युद्ध होकर दो प्रकृतियों, दो जीवन-मुल्यो के बीच का युद्ध था। इसे धर्म का अधर्म से, सत्य का असत्य से, न्याय का अभ्याय से, सदा- चार का कदाचार (दुराचारी) से युद्ध कहा गया है

रामायण मे राम दो रुपो में दिखाई देते है। एक सत्याग्रही राम, दूसरे शस्त्रा- ग्रही राम स्वय कप्ट उठाकर मूलतः सात्विक प्रकृति के लोगो के हृदय जीतनेवाले सत्याग्रही राम बहुत सम्भव है पूज्य गाधीजी के आदर्श रहे हों। पर मूलत, दुष्ट प्रवृत्ति वालो को जड मे नष्ट करने वाले राम की भारत के साधुनक्षेत्र में अवहेलना होती है। वर्तमान भारत के एक अत्यन्त ज्येष्ठ सतत मे सुन्दरकाण्ड मे हनुमान हारा किया पराक्रम भौ प्रक्षिप्त मातकर प्रवचन में उसका वर्णत करना टाल दिया। इतना ही नही, पूरा युद्धकाण्ड भी टाल दिया और उसमे रामायण को सुखान्त बनाने का बहाना बनाकर रामराज्याभिषेक पर रामायण-प्रवचन समाप्त किये।

भारतीय जनता की भ्राति का लाभ उठाकर ये आधुनिक सन्त घाद्दे जितना राम, कृष्ण आदि को अहिसक बनाने का प्रयत्न करें, पर उनके दुर्भाग्य से भारत के अधिकाश देवता शम्द्धारी हैं केवत एक शम्त से सन्‍्तोष होने से चतुर्भुज, अप्टमुज बनाकर उन्हे शस्त्तों से लाद दिया गया है भारतीय मान्यता में सृष्टि, स्थिति मोर लय तीनो का सन्ठुलन हैं सहार-शक्ति का नाम ही शिव (कल्याण- कारी ) है। जीवन की इस वास्तविकता को भारत के धामिक क्षेत्र के लोग जब तक टालते रहेंगे, तव तक राम-द्रोहियो की सख्या मे, वल मे, प्रभाव में वद्धि कभी भी रोकी नही जा सकती भााज केव॑त्न क्षाधवे से अधिक का भारत रामद्रोही बना है ।राम भवित का यही स्वरूप बना रहा तो आगामी १-२ शताब्दी में रामायण ग्रन्थ, सग्रहलयो को मात्त शोभा बढाने वाले रह जायेंगे। इस पृष्ठभूमि में मानवो के लिये सर्वांगत अनुकरणीय मर्यादा-पुरुषोत्तम राम की गाथा पाठको को प्ेवा में प्रस्तुत है।

द्वितीय तृतीय आलोक में दोनो परम्पराओ का सक्षेप्र मे राम की ऐतिहा- सिकता स्पष्ट हो, इसी दृष्टि से सक्षेप मे वर्णव किया गया है वामन के पूर्व अब- तारो की अलौकिकता में भी ऐतिहासिकता हो सकती है, यह सकेत भी पाठकों को

सहज ही समझ में भा सकेगा | स्थानाभाव के कारण लौकिक परम्परा का भी बहुत ही सक्षिप्त वर्णन करना पडा है, जिसका उद्देश्य यही है कि राम का अनेकागी चरित्न उभर कर सामने आए | जमे भागवत, वायुघुराण आदि मे भी जो वशावलिया दी है वे भी उन्होने पक्षिप्त ही दी हैं। बश्े प्राधाना एतस्सित्‌ प्राधान्यें प्रकीत्तित (३१२६४२१२ बायुपुराण) भागवत में कहा है श्रूयता भानवो वंश प्राण परतप इस सन्दर्श में मेरी धृष्टता क्षम्य मानी जावेगी, यह विश्वास है। शेष आलोको के बन्द मे, उपमहारो भें लेखक दृष्टि से उन आलोकों की पिशेपताओं का विश्लेषण किया गया है, जिनसे वानर आदि की उत्पत्ति, अगो व्या- काण्ड में हो राम-राज्याधिपेक, देवलो नरलोक की दावण-वंधनसम्वन्धी मिली- जुली योजना तथा उसका ऊमवद्ध क्रियान्दवव, वालीबध का विशेष महत्व, हनुमान की भह्वितीयता, विभीषण का सत्याग्रह, युद्ध का उद्देश्य, सीता का पुतर्त्याग, शम्बूक- वध, राम का आत्मोत्सगग अपदि विवादास्पद अंग बनाये ग्ग्े विषयों पर प्रकाश डाला गया है, जो आज के सन्दर्भ में चुद्धिग्राह्म माना जावेगा परिशिष्ठ मे भार- तीय मान्यताओ सम्बन्धी विविध जानकारी दी गयी हे जो भारतीय मतीपियों की तत्कालीन विन्तनशक्ति तथा ज्ञान का चोतक है। साथ ही सम्पूर्ण रामायण मे चव्त प्रमुख चटनाओं फी तिथियों की उपलब्धि “रामजीवन' ऐसिहासिक होने की पुष्टि करती है! मानव काल-गणना के एक विद्वाव 'देवकीनन्दन खेडवाल' द्वारा किया गया अनुसन्धान भी विचार-अ्रवर्तक हे। इन्ही दित्ों पूत्रा के डा० वर्तक ने वाल्मीकि को आधार बनाकर ज्योतिप शास्त्र के गणित के अनुसार मग्रेणी तिथिया भी देने का प्रयास किया है। जिज्ञासु पाठक उसे पढ सकते है ससार के लिये शाब्वत काल तक मार्गदर्शक करने वाला क्षध्यात्म-प्रधान लोकोत्तर रामजीवन श्रुत सहरति पापाति के नाम १९ केवल अजंपयोग का साधन वनकर लौकिक जीवन का णुद्धिकरण कश्ने वाला अमोष शस्त्त चन सके, मही लेखक की आकाक्षा रही हे लेखक के अचुसार वाल्मीकि ने भगवान राम का नहीं अपितु नर से नारापण बनने वाले राम का चरित्र-चित्रण क्या है। इस स्थिति मे हिमालय से थी उच्च राम-जीवन को लेखक जैसे तिमके द्वारा नापने का अथवा जादि कवि महपि वाल्मीकि के रसबुकत समुद्र को सीप द्वारा उलीचने का गह्‌ हु साहसपूर्ण प्रयास द्वास्यास्पद ही माना जा सकता है पर भ्रगवान के दरबार भे हम जैसे सभी वालकों को स्वच्छन्दता से उछलकूद को जो स्वतद्वता होती है उसका लाभ उठाया गया सेतुबन्ध से राम कार्म मानकर यदि गिलहरी योगदान करती हुई सुनो गयी है तो सब्र दष्टि से दीन, हीन, अज्ञ, कुशील कुब्ुद्धि मुझ जैसा व्यक्ति राम-कथा का लेखन कर स्वय को पविव वव्ावे का प्रयास करे तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिय्रे इस पृष्थभूमि मे ही मालिक का लुटाया जा रहा माल केवल कूली मात्न बनकर जनसाधारण तक पहुचाने का प्रयास पाठको द्वारा क्षम्य

जरा

होगा, यह विश्वास है

इस अन्न प्रयास के सम्बन्ध मे आधुनिक व्यास, झूसी के सन्त परम श्रद्धेय ब्रह्मचारीजी ने आशीर्वाद स्वरूप जो शब्द लिखे हैं उससे यह आलेख पढने योग्य बन गया है उनका अत्यन्त अत्प-सा आशीर्वाद पढकर भी लेखक का रामायण अध्यमन विषयक अहकार जाता रहा। फिर इस शताब्दी के मौलिक विचारक भ्द्धेय ठेंगडी जी द्वारा लिखित प्रस्तावता के कारण पुस्तक वस्तुमूल्य निश्चित ही बढ गया है! इन दोनों का सदेव ऋणी रहने मे ही मेरे जन्मजन्मान्तर के कलुष कम होते की सम्भावना है, अत. आभार मानने का दुस्साहस कर मैं स्वय की पराप-निवृत्ति मे बाघा नही बनना चाहता। पुस्तक के लिये ली गयी विविध भ्रन्यों की सहायता यह उनके नये-पुराने श्रेष्ठ लेखको के प्रति मुझे ऋणी बनाती ही है। उनके उपकार का बदला चुकाने कंग सामर्थ्य मुझमे नही है।

गोदिया के स्व० प० सत्यनारायणजी के पुत्न श्री मुरलीधरजी, नागपुर के अवकाश-प्राप्त टिकट-निरीक्षक श्री रा० रा० सोहनीजी, सस्कृति बिहार, राची के श्री ओबेरायजी आदि का मैं नि सकोच ग्रन्य उपलब्धि करने के लिये अत्यन्त आभारी हू। पुस्तक की मूल अवाच्य हस्तलिखित प्रति का सशोधन एवं टंकेण करने में सहायक श्री मनौडी जी एवं रामपुर के थ्री भगवतीजी का स्मरण सदा ही बना रहेगा शिवानन्द आश्रम के अधिप्ठाता पृज्य थ्री चिदानन्दजी जिनकी प्रेरणा एव हृदयस्पर्शी वाणी से मन के कलुप धुलते रहे हैं, का स्नेहपूर्ण सान्तिध्य इस पग्रन्य- सेखन का आलम्ब बना है। साथ ही सशोधित मुद्रण-प्रति तेयार करने में सुरुचि प्रकाशन वालो का सहयोग भी उल्लेखनीय है। विशेषकर टकित पाण्डुलिपि का सशोधन चि० कु० मधु वर्मा ने किया है तथा उनका निर्देशन डा० श्याम बहादुर जी ने किया है। शायद उनके संशोधन से जहा मैंने भापा कैसी लिखी जाये यह सीया वहा भाषा मे जो कुछ भी सफाई आयी है वह अभिन्‍न मित्र श्री श्यामजी की ही देन है, अत इन सभी का मैं हृदय से आभारी हू।

अत में लगभग ५०० पृष्ठ, १० मानचित्र तथा १४-२० विशेष प्रकार के छायाचित्रों के साथ इस वहद्‌ ग्रंथ को कौत छापे यह समस्या पिछले डेढ-दो वर्ष से सुलझ नहीं था रहो थी। श्रद्धेय लाला हसराज जी ने सदा की भाति अति उदार हृदय से १०००० ]२० अग्निम देकर जहा प्रकाशको कय उत्साह बढाया वहा खरीदार को भी पुस्तक अल्पमूल्य मे मिले यह इच्छा प्रकट की दूसरी ओर डा० कर्णसिह्‌ जी ने अपने ट्रस्ट द्वारा १०० पुस्तकों की अग्रिम कोमत देकर भी पुस्तक प्रकाशन में महयोग दिया स्वाभाविक ही प्रगतिशील विचारों के होने के बाद भी अति श्रद्धालु श्ली दीवानाथजी ने णकाशन की सपूर्ण व्यवस्था विना झिझक के स्वीकार की इन तीतो का मैं कित शब्दों मे आभार व्यक्त करू, यह मेरे लिये अनाफलनीय विषय है

जाप

इत भब्दों के साथ धर्म, सत्यवाद, दृढ़क़ती राम के चरणों में यह रचना- पुष्प अषित कर अपनी बात समाप्त करता पाठकों से मिनम्न श्रार्थना है कि मेरे दोष छोड़कर केवल ग्रहणमओग्य भगवान राम के गुणों की ओर ध्यान दें दृष्द किमपि लोकस्मिन्‌ निर्दोष ते सिगुंणम्‌ तस्मात्‌ दोषान्‌ परित्यन्यगृह णात्तुवृणाल्वुधा

बालमुकुद आश्रम विश्वनाथ लिमये पुष्कर ३०४०२२ लिमये तिवास! भमत चतुरदंगी २०३६ रैलथेली,

ग्रोविया-2४१६१४

श्री निवेदन द्वितीय संस्करण

प्रभु की कृपा से ऐतिहासिक पुस्तक अपेक्षा से अधिक लोकप्रिय हो गयी। अत प्रथम वर्ष में ही इतने अधिक मुल्य की ११७० प्रतिया समाप्त हो गयी जिसका बहुत बडा श्रेय सरस्वती विहार के श्री दीनानाथ मेहरोत्ना को है। अग्रेनी सस्करण भी समाप्त प्रायः है) सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भरी रृष्णा अय्यर जैंसो को पुरतक विशेष अच्छी लगने से केवल दक्षिण की सब भाषाओ में इसके भाषातर मुद्रित होना प्रारम्भ हुए हैं अपितु गुजरात एवं वगाल में भी यह प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है। शिक्षा मत्तालय की भी विशेष कृपा होने से विविध प्रकार के अनुदान के अतिरिवत जमनी से हो रहे अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तक मेले में भी मत्तालय की ओर से यह पुस्तकें प्रदर्शनार्थ भेजी गयी हैं

स्वाभाविक ही दूसरा सस्करण प्रकाशित करते समय अनेक ज्येष्ठो की राय से यही विचार ववा कि हिंदी में भी यह पुस्तक दो भागों में निकाली जावे। ईश्वरीय योजनानुसार अग्रेजी मे इसके दो भाण करने पड़े ग्रे जिस कारण 'सत्याग्रहीराम' तथा 'शस्त्राग्रही राम' ऐसे नामकरथ प्राप्त हुए थे, जो अनेको को बहुत अच्छे सगे। इसी पृष्ठभूमि में ऊपर के चित्र बदलने का भी अवसर मिला जो अधिक साथंक लगेंगे। मुझे पगपग पर यही अनुभव होता है ।क यह सब कुछ कोई तृतीय शक्ति हो अपने इशारे पर करवा रही है

अन्यथा प्रथम सस्करण के विक्रय मे १०,०००/- से अधिक की हानि हुई थी। पाठकों को अल्प मूल्य में पुस्तक उपलब्ध हो, इस मोह मे ३५/- मात्र रा था। पर विक्रेताओं के कमीशन की जानकारी के अभाव में लागत से बहुत अधिक मात्रा भे घादा हुआ अत मूल्य बढ़ाने का विचार अपरिहाय था इन दो खो के कारण पाठक कुछ मूल्य वृद्धि को भी उचित ही मानेंगे ऐसा विश्वास है। विभाजन करते समय परिशिष्ट भी जहा दो भागों मे किये गये हैं वहा दूसरे खण्ड में केवल अलग से प्रस्तावना जोडी है। प्रथम खड में ४-५ ज्येप्ठ पुएपो के अभिपष्राय जोड़े गये हैं जिससे पुस्त 5 का योग्य मूल्याकन करने में सहायता होगी

दूसरा सस्करण निकालने मे भी अनेक वशु सहायतार्न सामने आये जिनके सहूयोए में ही मह सम्करण सभव हो पाया | छिंदवाड़ा के डा० वसतराव पराज॑गे ने ५,०००/-की राशि देकर कतार्थ किया। वहा बबई के राहुल वित्दसे तथा छोटेबाल जी ने भी पुन २,०००/- की राणि देकर अपना विश्लेप स्नेह प्रकट लिया है। इस मस्करण को जहा गाते पकाशन से बविन्रय हतु रचीकार कर अबना स्मेह प्रकट फ़िया है बहा ग्रेफिक वल्डे ने आफस्रेंट पर अल्पग्रत्थ मे २,००० प्रतिया चविकलवाकश अनुग्रद्टित किया है।

जत मे मैं वालमुफुद ब्यथम के १० स्वामी नरसिहाचार्य जी (छोट महाराज) तथा उनकी धर्मपली धीमती चम्द्रकाता जी (चाचीजी) से विशेष अनुगृहित हू जिन्हांत रूसरे सम्करण से आवश्यक योगदान के अनिरिवत किशोरों के लिए निकलने वादे चित्रमय महामानव राम' का संपूर्ण भार वहन करने की रूपा कर मुझे पूर्णत चिताधुक्त किया है इनके स्तेह एवं क्रपा से उऋण हाना मेरे सामर्थ्य के बाहर है। अत उमका निर्वाह करने भे मुझे आनन्द है

पुष्काश मंदिर, ऋषिकेश

सेहामित्रापी भारगशीप पिया २०४३

विश्वताथ लिभेय॑

ड्थ

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

भारतवर्ष के लोगो के सम्मुख प्रभु रामचन्द्र का जीवन एक आदर्श पुरुष, मानव-सामर्थ्य के लिये जो सर्वोत्त उन्नति सभव हो सकती है, उस मर्यादा पुरुषो- सम के रूप में अक्िंत किया गया है। रामचरिस्न के महान्‌ गायक वाल्मीकि ने प्रभु रामचन्द्र के अवतार पर विश्वास होते हुए भी बहुत प्रयत्लपूर्वक उनको अद्भुत, रहस्यमय एव दैवी शक्तियों से युवत अवतार के रूप में चित्रित नहीं किया है, अपितु मानवीय ग्रुणो, मानवीय भावनाओं तथा मानवीय सामर्थ्य-सम्पन्त एक मनुष्य के सूप मे प्रस्तुत किया है। एक ऋषि एव दृष्टा के नाते वाल्मीकि ने देखा कि लोग इस दुर्बलता से ग्रसित है कि श्रेष्ठ अवत्तार तामस्मरण के लिये हैं नकि अनुकरण करने के लिए

हमारे समाज की परम्परागत दुर्बलता का भान होने के कारण वाल्मीकि ने मानवीय विकास की चरम सीमा तक मानवी ग्रुणो के अनुपम आदर के झ़प मे प्रभु रामचन्द्र को, मानवीय गुणों से युवत्त एक मानव के रूप में ही प्रस्तुत किया उतवी माता-पिता के प्रति भवित, भाइयों के प्रति स्नेह, पत्नी के प्रति प्रेम-उत्तकी करुणा और विशुद्धता मे--सबके प्रेम का विषय बन गया है। ये और प्रतिदिन के मानव-जीवन के अन्यान्य पक्षो को इतने उत्कृप्ट रूप में रखा गया है कि जिनसे स्फूर्ति ग्रहण कर सर्वसाधारण मनुष्य अपने दैनिक जीवन को उस उज्जवल आदर्श के अनुसार ढाल सर्के तथा उन्तत कर सकें। जित कठिनाइयों से वे पार निकले, माता- पिता तथा बाद मे अर्धागिनी के विंयोग का दुख सहन किया और अत में पाप एवं अधममं की शक्तियों पर उन्होने जो विजय प्राप्त की, उससे हमारे हृदय में आशा की लहर पंदा होती है, विश्वास को अकुर उगत्ता है। अदग्य साहस की स्फू्ति प्राप्त होती है और समस्त आपत्तियों से लोहा लेकर, उन पर विजय प्राप्त फर इस पृथ्वी पर अपने को ईश्वरीय प्रतिभ के अनुरूप हम बना सकते है।

उपर्युक्त पृष्ठभूमि में श्री रामचद्ध द्वारा स्थापित 'रामराज्य' में शाति का साम्राज्य छामा था, लोग धर्म और कततंव्य का पालन करते थे और सुखी और वैभव का जीवन विताते थे 4 श्री रामचन्द्र के जीवन के ये पहलू उदाहरणार्थ परि- स्पिति का आकलन करने की क्षमता, राजनैतिक सूक्ष्म दृष्टि, राजनीति ज्ञता, अपना

ज्शां

सव कुछ समपित कर जमसेवा का व्रत, ढुष्टो का विईलन, दुप्टी के चगुल से विप्पाय लोगों की मुवित और रक्षा, धर्म का अभ्युत्यान अर्थात्‌ समाज की धारणा, जिससे विषमता का निर्मूलत, विभेदों मे सामजस्य, परस्पर शह्गृता का निवारण तथी बिगुल विविधवा में प्रकट होने वाले जन-जीवन मे मौलिक एकता का साक्षात्कार होता है।

मानव का नेतृत्व करने वाले लोगों मे, सार रुप में जिन गुणों की आवश्यकता है और शाम राज्य की प्रतिप्ठापना की जो पूर्वपीठिका है, वह पूर्णतया शुद्ध व्यवित्व- गत जीवन, समाज के सुख-दुख में समरस होने की क्षमता घोर परिणामत स्वयं स्वीकृत आत्मसयमी जीवन और अजेय पैमिक शोर्य हारा भी, जनता के इन क्लेशों को उत्पत्त करते वाली आक्रमक शक्तियों का दमन करने का चातुर्य, सत्य के प्रति प्रेम, वचन-पालन का सककह्प, फिर उसके लिये चाहे जो भी त्याग करना पढे और जन-द्वित-सिद्धि के हेतु परिपूर्ण आत्मसमर्पण, चाहे उमके लिग्रे फिद कितने ही त्याग की आवश्यकता हो और सबसे महत्वपूर्ण बात हूं समाज मे धम और सस्क्ृति पर अटल तिष्ठा | ये तथा अन्य अनक गुण जो इस महान जीवन में प्रकट हुए है, उन्हें उन सब लोगो को अफते अन्दर तिर्माण करने की आवश्यकता हे जो हमारे समाज को आज दूं ख-ठरिद्वम ये समृद्वावस्था की ओर तथा अध पतन से गौरव की ओर ले जान के लिये प्रस्तुत है अत्यधा रामराज्य केवल एक अर्थ हीन गन्द के रुप में हमारी जिल्ला पर रह जाथगा और वह कत्पना स्वप्न रह जायेगी, साकार नही होगी

श्री रामचन्द्र के जोबन में माववता की मद्गानता निहित है आज समस्त देश पर नैराश्य एवं क्षोम की घटाये घिरी हुई है और जनता अनुभव करती है कि वै सब लोग, जिनके हाथ मे नेतृत्व की बागडोर है, वैसे नहीं है जेसे उन्हें होना चाहिये था | लोगो के मन की यह सुप्त अभिलापा कि उन्हें श्रकाश और योर्य मार्गदर्शद तथा ऐसी प्रेरणा प्राप्त हो, जिससे निराणा के घनाधकार में भी प्रकाश दिखाई दे, दिन-प्रतिदिन भौर अधिक तीज होती जा रही है ऐसी परि- स्थित्ति मे श्री रामचन्द्र का जीवन हमारे पय-प्रदर्गन के स्िये आशा वी किरण है |

मा० स० गोलचलकर ट्वितीय सरसधचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक सेघ

ह्षययता

पूज्य श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी का आशीर्वाद,

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की एक झांकी

रामो राजमणि: सदा विजयते राम रमेश भज़े।। शामेणानिहता निश्वांचर चम्‌ रामाय तस्मे नम ।॥। रामान्नास्ति परायणं परतर रामस्य दासोउस्म्पहम्‌ रामेचित्ततव सदा भवतु में हे राम मामुद्धर ॥' छ्ष्प्य सदा राम को विजय रामक्‌ भजू मिरन्तर। सैन्य निशाचर सकल रामद्वारा गत सुरपुर॥ जिनिमे जोगो रमे रामके चरन परत हू। नही रामतें बडो रामतें विनेय करत हू॥ सदा राम को दास हू, रमे रामभें चित्त मम। तातें हे श्लौरामजी, पद पदुमनि मे परत हम

“राम” एक परम चमत्कारी है। श्री दशरथजी के यहा श्रीरामजी का लावि- भाव हुआ उससे पहले भी 'राम' ताम रखने की प्रथा थी | मह॒पि जमदग्नि मे अपने पुत्त का ताम राम ही रखा था फरसा बाधने से वे परशुराम कहनलाये (इसी प्रकार श्री कृष्ण के बडे भाई का नाम भी राम ही रखा गया, बलशाली होने से वे बलराम कहलाये।) राम तो नित्य है, शाश्वत हैं, अव्यकत है, अविनाशी हैं, अजम्मा हैं, अशरीरी हैं। ये सर्वव्यापी, सर्वात्मा, सपुर्ण ससार के कर्ता-भर्ता-सहर्ता हैं। वे अणु-परमाणु में व्याप्त है, उनका कोई रूप नही, नाम नहीं, धाम नही, प्रतिमा नही, इन्द्रिय नही, मन नहीं समस्त प्रपच से परे हैं वे त्रिपाद विभूति में घ्थित रहते हैं। चे जन्म मरण से रहित हैं, फिर भी वे लोक वल्याण के निमित्त

4. इस क्नोकृ के राम शब्द मे साठो विभक्तिया जाती हैं। राजमंणि राम की सदा जय हो (प्रयम्मा) रपा के स्वामी राम वो (ट्वितीया) भजना चाहिये शाम ने (तृतीया) समस्त निशाचरों की सेता को मारा उन राम के लिये (चतुर्थी) नमस्वपर है राम से (पचमी इदुकर शोई नहीं है। उन राम का (पष्ठी) में दास हू। मेरा बित्त राम से ([सप्तमी) धर जाए। दे राम ! (सम्बोधन) मेरा उद्धार करो 4

| दर्शक

अदपैक रूपो मे लवतरित होते हैं

जास्तव मे अंग्वान्‌ तो तिराकार हे, उनका कोई आकार नहीं है। अशरीरी' है, उनका कोई शरीर नही थे सर्वेज्ञ है, सर्वगवितमाव है, कर्तुमकर्तुमन्मया कर्तूँ समर्थ गर्थातु वे सब कुछ करने मे समर्थ है, इसीलिए अशरीरी होकर भी शरीर घारण कर लेते है, अजन्मा होकर भी जन्म ले लेते है। यदि भगवान्‌ जन्म लें तो हम सस्तारी लोगों को भगवत्‌ की प्राम्ति कैसे हो, क्योकि अव्यक्त में हम व्यक्ति जीव--देहघा री प्राणी चित्त को कैसे लगा सकते है। बव्यक्त की उपासना अत्पन्त कठिन है। गीता में अजुत ने भगवान्‌ से पूछा--एक तो आपकी भक्ति में तललीन होकर आपके व्यवंत्त तप अवतारादि का ध्यान चिन्तन करते रहते हैं, इूसरे अव्यक्त प्रह्म की उपासना करते है, इन दोतो मे श्रेष्ठ कौन है ?

भगवान्‌ ने कहा--भाई मेरे मन की बात पूछते हो ती मेरे मत में तो जो मेरे झवतार हूप में मन लगाकर नित्ययुक्त भाव से, पराभकित से सयुक्त होकर मेरे व्यक्त रूप का ऋजन करते है ने ही श्रेष्ठ हे। अजुन ने कहा--तथ जो वक्षर, अव्यक्त, अचिन्त्य, अचल, अनिदेण्य, सवंव्यापी, कूटस्थ नित्य मिराकार की उपा- सना करते है वे क्या कनिष्ठ हू ? भगवान ने क्ह्मा--तही, ऐसी वात नही है जो दिराकार के उपासक, इन्द्रियो का भलीभाति ययम करके, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत रहते हुए, सर्वत्न समबुद्धि वाले, अव्यक्त उपासक भी मुझको ही प्राप्त होते है क्षिन्तु भैया ! सोचो तो सही जो देहधारी है, वे बिना देह वाले अव्यक्त ब्रह्म को क्या श्षरत्ता से श्त करण में बिठा सकते हे? देहधारी को अव्यक्त की उपासना उद्तनी ही कप्टप्रद हे जितनी गया जो की घारा को समुद्र से लौटाकर फिर गगोत्नी में लाया जाना। इसलिये जव्यक्त ब्रह्म से आसक्ति वाले पुरुष को अत्यन्त विशेष कप्ट हीता है ।*

भगवात भक्तों की उपास्तना को सुलभ करने के निर्मित्त मानव रूप से प्रकट

एवं सततयुक्‍्ता ये भक्ताम्त्वा परुंचासते ये चाप्यक्षर मब्यक्त तंफा के योगवित्तमा श्री भगवानुवाव--भव्यायेश्य मनो दे मा नित्यपक्ता उपालते श्रद्धपा परपोपेतास्ते मे बुक्ततमा मता ॥.. ये त्वक्षर सनिदेशयमन्यक्त पर्युवासते संवत्नगमचिन्त्यच कूल्स्थ मचल अब सतियम्थेल्दियग्राम सपत्त समचुद्धय ले प्राप्तुवन्ति मामप सब भूठहिते सता आे क्नैणाइधिकतरस्तेपा मन्यक्तासक्त चेतसाम्‌ जव्यक्ताहिकतिदूं देहवेदओ रवाप्पते॥

और गी० इशअ० (१, २, ३, ४, ४)

ड्ड

हुआ करते हैं। अवतार भी कई प्रकार के होते है। कल्ावतार, अंशावतार, आवैश- बतार, पूर्णावतार आदि-आदि। हमारे श्रीरामजी मय पुरुषोत्तमावतार हैं। उनका चरित्न चितनीय तथा अनुकरणीय है। उनके चरित्न का उत्तम पुरुषों को अनुकरण करता चाहिये जो लोग उन्हें मवतार भी माने, किन्तु उनके चरित्ध तो इतने पवित्न है कि उत्तम पुरुषों को उनसे शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये भगवान वाल्मीकि ने श्रीराम को अवतार तो माना है, किन्तु उनके मानवरूप का ही विशेष वर्णन किया है, क्योकि वे राजाराम बनकर प्रकट हुए। उन्होंने अपने को राजा दशरथ का पुत्र मानकर ही समस्त चरित्न किये। श्रीकृष्ण लीला पुरुषोत्तम हैं। उनके वचनों की---उनकी भाज्ञाओं ओर उपदेशो को---तो मानना, किन्तु उनके आचरणों का सर्वत्न अनुकरण नहीं करना चाहिये | भागवत में भगवान व्यास ने शैसी ही आज्ञा की है।' श्रीरामचन्द्रजी तो मर्यादा पुरुषोत्तम है उन्होंने मानवमात्र को अपने आच- रण से शिक्षा दी है। जो लोग अर्ये और काम के ही दास हैं, वे श्रीराम जी के चरिद्व से शिक्षा ग्रहण नही कर सकते एक महात्मा ने मुझे बताया कि एक ईसाई धर्मोपदेशक उनके पास आया। उसने उन से कहा--“मैंने २७ बार वाल्मीकीय रामायण पढी है ।” , महात्माजी ने उनसे पूछा--आपने इतनी बार वाल्मीकीय रामायण पढ़ी है, तो उसे पढ़कर क्या निष्कर्ष निकाला ? उन्होने कहा--मैंने यही निष्कर्ष निकाला कि “भरत महामूर्ख था। भला जिसे नाना से दशरथ द्वारा की हुई प्रतिज्ञा के अनुसार नियमपूर्वक राज्य मिल रहा है, पिता ने उसे राज्य का अधिकारी घोषित कर दिया है। अपनी सगी मा और सौतेली मा उससे राज्य ग्रहण करने की हठ कर रही है, उनका कुलगुर उन्हें राज्य करने को कह रहा है, फिर भी वह्‌ इतने बडे साम्राज्य पर लात भारकर अपने बनवासी सौतेले भाई के पीछे भटक रहा है उसके आने पर उसकी चरण पादु- काओ को राजपिहासन पर पधारकर साधु जीवन बिता रहा है, उससे बडा मर्ख ससार मे कौन होगा ?” महात्मा जी ने पूछा---और क्या निष्कप निकाला ? वे बोले--भरत से भी बढकर महामू्खय सीता थी | भाप सोचिये, पिता ने राम फो ही वनवास दिया था, सीता को तो वनवास नही दिया था। वह इतने समृद्ध राज्य को परम ऐश्वर्य सम्पन्न राजमहल को त्यागकर अपने वनवासी पति के पीछे कटकाकीर्ण वनो में नगे पैरो भटकती रही नाता क्लेशो को सहन करती रही अन्त मे रावण उसे हरण कर ले गया नो महोने उसके घर मे सोती बिलखती

4. ईश्दराणर वच सत्य तर्थदाचरिठ ववचित्‌

है

रही “ससे बढ कर सुर्खता समर कान सौ स्त्री कर सतती है। महात्मा ने कद्दा--भाई, ठुमने अपना बुद्धि के अनुसार राभायण का अर्थ ही नहीं समझा | धॉत सर # कि जिनके जीवन का लक्ष्य समारी भागा वा हो भौगने का है, जी खाता पिलों मौज फरये को ही जीवन का लध्ष्य समजने है, शमायण को क्या समझेग ? के सरत और सीता के जीवन की कैस जान सकते है नहीं तो ससा” बर की हिगी भी मापा में भरत नी आर सीता जी से उत्कृष्ट चरित्रवाया खोजन स॑ भी नहीं मिीर सकता हम लागा के वश परस्पर से पत्यकात से हवा ऐसे सस्तार फन्‍मे हए हैकि सम्यूण जान के सागर बह्मा जी ही यह्ठ सट हुई है। उतके मरीचि, अत्ि, खगिरा, पुलस्त्य, पुमह, कतु, भृगु, वेसिग्ठ, दक्ष जार पारद ये पूजहुए ये वी ब्रह्मा जी की भाति राबगुण मम्पत्त औौर परसतानी प। इस्ही के 6? समस्त संसार के जीव की उत्पत्ति हुई जव हम छोट ये बार हमे इनिहास पढाया राया, सो यह बताया ग्रवा कि पहले ध/रत में दनायें आदिवासी (बन में रहन वाले बनवासी) ही बसते «। भार्य लोग दुसरे देश से यहा आय नसम्य जगनी थे। पेरा के मीच रहते वे, गच्चा थाम खाते थे | तव तक उन्हू क्षरिन का जान नही था| एक दिन दो वेणडिया के रणटने से अरिन उत्पत्ल हा गयी उन्हान उस देयता माचकर उसकी पूजा करनी मारम्भ कर दी। उसे मास पिलाने लग घाव पका मास उन्हें स्वाद्िट्ट लगने छगा। तब मास पका कर खाते तगे। फिर झरने शने बीज़ा हो इकट्ठा करके खेत करन की। फिर घर बनाते लगे कहने का जश्षिप्राय ण्हू /कि असक्य से आहतिक सभ्य बल सै पल्चिसी विचार पाच हर वप मे आग कुछ जानते ही नहीं। इस्ही पाच सह घ्षों में राम, ऊष्ण महा वारत सात हो गग। यदि इस मान्यता को स्वीकार क्या जाग्रे तो हमार समस्त यद, पुराण, रन शाम्त्र भागम सव अम्य है। सत्पयुग, करता, द्वापर, कीयुण आदि की करपना सब ज्ञामक है। तरह, जमदग्ति, भरह्ाज वसिष्ठ सब जगली अमध्य ७। धश्च प्रकार की इतिहान की कल्पना वाले औलिकवादी, ०रझा्य से लविदील महामूर्ख नोग हैं। उके मत मे यनति करम-कर्ते अब परूण सभ्य हुए है। थे सभ्यता की व्यास्या, ऊडे ऊब्े भवव, सद्दे-जरे पके रा्जण्प, रेल, तार, मोटर वायुधान, दूरलवण, द्रन्दर्पत इन भौतिक पदार्थों का ही मानत है। हमारे यहा सभ्यता के चिह्न ये दाह्म मौतिक्न पदायथ कभी नहीं माने गये है। हमारे यहां तो चला, पबिक्षेता, दया, लमा, याय, सन्ताय, सरवता, शम, दम,नप, समता, नि्िक्षा' उपरति, शास्क्ष-विचार, ज्ञान, वैरप्तप्र, ऐश्वये, वीरला, तेज, बल, स्मति, स्वतत्ना, कौशज, वान्ति, धैयें, कोमजता, निर्भोकता, वितय, साहस उत्साह, सौभाग्य, गंभी- पता, स्थिरता, आस्लिकता, चोति, गौरव और निरहकारता आदि भंदगुण हो

बडा

उन्नति के लक्षण माने गये है

हमारे यहा तो कभी नही वहा गया है कि जिसके ऊचे-ऊचे वातानुकूलित भवन हो, भाति-भाति के वस्त्रों का भडार हो, समस्त भौतिक सुखोपभोग हो, वह्‌ सुसभ्य ब्राह्मण है। हमारे यहा तो गीता में सबसे श्रेष्ठ ब्राह्मण के लक्षण बताते हुए कहा है कि शम, दम, शौच, तप, शान्ति, ऋजुता, ज्ञान, विज्ञान तथा आत्ति- कता--ये ब्राह्मण के स्वाभाविक ग्रुण है। शोर, तेज, धैये, दक्षता और युद्ध में से मे भागना तथा दान देना और ईश्वर भाव ये क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण हैं ।* हमारे यहा वाह्य भौतिक उन्नति को उन्नति नही कहा गया है। हमारे यहा तो आन्तरिक्‌ सद्‌गुणों के विकाम का ही नाम उन्नति है।

इसीलिए वाल्मीकि रामामण में सबसे पहले यही पूछा गया हे कि इस समय शीलवान्‌, ग्रुणवान्‌, यशस्वी, तेजस्वी, दाता, इद्विमजित्‌ आदि सदगुणों से सम्पन्न कौन पुरुष है ? तो कवि मे बताया वे राम है ।राम सदृग्रुणों के भडार है। इसी लिए ससार ने उन्हे अपनाया राम से बढ़कर आदर्श लोकप्रिय पुरुष नही हुआ इसीलिए वे पुरष नही पुरुपोत्तम वहलाये। इन्होने सद्युणों की मर्यादा का सेतु बाघ दिया | इसीलिए थे मर्थादा-पुरुषोत्तम कहलाये

कुछ लोगो का कहना है कि राम नाम का कोई ऐतिहासिक पुरुष नही हुआ। यह तो कवि की कल्पना मात्व है! जैसे उपन्यासों में काल्पनिक पात्न बना लिये जाते हैं ऐसे ही “राम” एक वाल्मीकि के काल्पनिक पात्न है। ऐसा कहने वाले वे ही पुरुष हैं, जिन्हे धर्म तथा मोक्ष का ज्ञात नही है। राम को आप अवतार मानें तो कोई आपत्ति नहीं, क्योकि उन्होने मनुष्य का रूप धारण किया। जन्म से महाप्रयाप्र तक मानवीय लोलाए की वे वालक बने, बालको वे से खेल खेले वे क्षत्विय बने क्षत्रियो जैसे कार्य दिखाये वे पितृ-भकत, मातृ-भकत, ऋषि-भक्‍त बने। उन्होंने दुप्टो का दमन किया, शिप्टो का पालन किया, परिवार वी एकता की। वे एक आदर्श पुरुष पितृ भक्त, भातृस्नेह आदर्श राजा थे यदि वे काल्पनिक पुरुष होते तो ससार के अणु-परमाण में वे इस प्रकार व्याप्त नही हो सकते थे। उनका यश- सौरभ ससार के बोने-कोने मे इस प्रकार फैल नही सकता था ईसा, मूसा और मुहम्मद तो कल ही हुए हैं इन सबसे पहले ससार मे राम का ही यशोगान होता धा।

प्रो० हरवश लाल जी ओवरा निदेशक, मस्कृति विहार, ऊपर बाजार राची

प्‌ धमों दमस्तप शौच क्षान्तिशर्जवमेव च। ज्ञान विज्ञानमास्तिक्य ब्रह्मवर्मस्वभावजम्‌ शौय तेजो धृतिदाद्िय युद्धे चाप्यपतायनम्‌ दानमीश्वरभावदच क्षात्ष बर्म स्वभावजम्‌ + (श्री० म० भोता १८ अ० ४२, ४३ श्लोक)

ज्जपां

हे जपते यहा मम्छृति विद्वार मे एसे महतर चिला का, चस्तुओं है कक किया है, जिनमे सतार अर के देंशां में आरतीय सत्कृति प्रसार के ममाण मिलते हैं कुछ सचित्न विज्ञप्तिया दी उन्होंने प्रकाशित करायी हू। ईसा में ४६० वर्ष प्र ईयन के सश्जाट वारयबमु (हिल्दू) से यूनप्ल पर वाजधण किया कं सेसथत स्थ्यव के युप मे इसनी सता हर परप्क्य हो गयी ईसा से ४८५ ई० पूर्व सम्लाठ धारसबसू, का देहान्त हा गया उसाई सन्‌ ?८०ई० पूव बास्यवस्‌ के पुतर ईरानी सम्नाट खप- माश (जेरफ्सेज) ने एक विशात सै उदार पृचान पर चढ़ाई की उसकी सेमा दस बार भारतीय मेनिका की विशाल सदा था। उस भारतीय हीर वाज सैनिकों के तीरो का फल इस्पात का बचा हुआ था। इल भारताय वनुध्चरा मे मिल जस्ब, सीरिया फिलिम्दीन, मेसोपाटाम्रिया, तुर्की नफगानिस्ताव, आदि में इम्पान के लीक्षण तीरा द्वारा विजय प्राप्त ी, यूनानी वीरों को पराणित किया तब तक पश्चिम किसी मी देश का इस्पात रू शान नहीं था। ईसा की तीमरी जती पूर्व पजाब को मेलम नदी के तट पर जब सिकत्दर नें भारत पर घड़ाई की तो पजाव के राजा पु८ (पोरस। के साथ उसकी सत्थि हुई महाराज पुरु सिकल्दर को १० सेर उरपात सेट की | सिकन्दर उस दुलस वपुव' सातु को देखकर चकित रह गया भारतीय तीरदाज सैनिको के चिद्न प्रकाशित हैं तुर्की के 'लिम्पेरकास' सेशर के संग्रह दय मे चादी की भारत माता की स्थाती अभी तंह बरा हुई है। इस स्थारी की रचना रोम में बहा क॑ एक स्वर्ण रल्बेवाझर ने ऋुृश की प्रथम झ्तों में की है उसम भारत माला के सिर पर तंमाल पत्र निभित मध् मुकुट है। भव सुबुझ् ये दा ईख की पौर खगी दैं। भारत माता के बस्म हाथ में ईग्व का दई धनुप हे दक्षिणी हस्त आंजोर्बाद मुंडा में है। विण्व मे ईख थार शक्कर भारत की ही देव ; मा के अग पर भारत निभिन अत्यन्त मह्ाम मलमंत् वी साड़ी है जो शोम में सुवण समतोल मे विकती थी) मा का धासत शाकबन (सा- गोव) री लकडी का हेः पाय हाथी दात़ के है। चित्र के जासपाय चितककरा मुर्या, तोता, शिफारी, बुत्ता, लपर मदारोे सहित दो चीसे ह। ये सभी वल्लुए दो सहल्न बंप पृ धारह से रोम को तियएद होती जर्मनी एक सूय लाशगण की प्रतिमा ई० ६७ स॑ पूव की प्राप्त हुई है यह भूध पुजा समस्त बोरोप स् फैद गगी थी। पदि उवरे इविहास क॑ उपाकात से एसाउल का प्रचार मुझ जाता दो जाज सपूण यभार सूय पूजक ही होता जापान (नियुण देश) मे भारत क्ले सभी दवता पत्रितठित है। यहा के एव प्राचीन सूर्ति महूयि कसिप्ठे नी की उपनब्य है। जिसे बढ़ा के योग वससेल कहुत है। भगवान खिद की भी मूर्ति पा्त 6) सगोत दे मे सस्कत मापा का स्ंन्न प्रचार ण। १८ा्ी ईमा ही जताच्दी थे कलजिण से एक १७ वर्षीय शावप्र पौहित यये थे उन्हाने आधी दुनिया को विजय करने वाले छुदलाई खा (कैचल्य घर)

ब्रा

को महायान्‌ बौद्ध धर्म की दीजा दी थी वहां यायत्री मत्न अभी तक प्रचलित है। इन्डोनिसिया (इन्डोनिजिया) में महाभारत आज भी उपलब्ध है। सेन्‍्ट्रल अमे- रिका के स्वेटेमाला (गौतम अहल्या) देश में हनुमान जी की एक बहुत पुरानी मूर्ति मिली है। राजपि कम्बुज द्वारा सस्कारित देश कम्बुज (कम्योडिया) में हनु- मान जी की बहुत ही दिव्य मूर्ति है। वहा अब भी रामकथा “रामकीति' नाम से होती है, जो अत्यत रोचक और प्रेरक है।

“अकुरव्ट' सन्दिरो का एक विशाल नगर है। वहा को भीतो पर रामायण महाभारत के चित्र अभी तक सुशोभित हैं। लवदेश (लाथोस) में रामकथा को 'फालक फलाम' कहते है जो लक्ष्मण-राम का अपश्र है। वहा एक दूसरी राम कथा 'फोम्मचक' के नाम से प्रसिद्ध है। वहा को राजधानी लुआग प्रवग के भन्दिरों की भीतों पर राम कथा के अत्यन्त मनोरम चित्र अब तक शो मायमान हैं। यहा भग- बती सीता की अग्नि परीक्षा का अत्यन्त ही उत्कृष्ट चित्र है। वहा एक उडनशील गरुड का अत्यन्त मनोरम चित्र है जिसमे गरुड जी राम लक्ष्मण की नागपाश को काट रहे हैं। यवद्वीप (इन्दोनिशिय) मे प्राम्यमम रामकथा पर उत्क्कृष्ट मूतिकला का अद्वितीय पुण्पस्यल है रामायण के इस मूर्ति कलाशित्प तीर्थ मे रामचरित पर सहस्रों मूतियटल इस सुन्दर शैली मे उत्कीर्ण किये गये हैं। भारतवर्ष मे भी कही रामचरित पर इतने सुन्दर चित्न उपलब्ध नही है

लीलायाई (थाईलैंड) श्याम देश तो रामराज्य आदर्श विभूषित देश है। इसकी प्राचीन राजधानी द्वारावती नगर मे थी। सनू १३५० में श्यामनरेश ने अयोध्या नामक नगरी बसाई। थाई देश के राजाओ के नाम रामउपाधि से विभू- पित रहते है। जँसे राम खम्हेड, श्री सूयंवशराम, रामराज, रामाधिपति, देवनंगर राम, महावज्ञराम, बुद्धराम, महामतकराम, सुखदेवराम, रामामात्य,रामसुबन,राम पुत्र आदि आदि भगवान्‌ राम की मूति के चित्र वहा के मुद्रा पत्नी, डाक टिक्टो एवं बस टदिक्टो पर आज तक छपते है कठपुतलियी के नृत्यों मे रासलीला दर्शायी जाती है। नाना मुयोटे लगाकर नर्तेक राम लीला का प्रदर्शन करते है। बहा के लवकुश, हनुमान युद्ध, अश्वमेध, यज्ञ के अश्व का लवकुश द्वारा प्रति- शोध, भगवान राम, वषिराज सुग्रीव, घनुर्धारी राम, किप्क्धा में बाली एवं तारा, भगवती सीता आदि परम उत्कृष्ट दर्शवीय छाया चित्र हैं। यद्यपि कालभ्म से इन्डोनेशिया आदि देश मुम्लिम हो गये हैं। किस्नु इन्होंने रामलीला को नहीं छोडा है। सुकर्ण आदि राष्ट्रपति तक रामलीलाओ के भ्रदर्शनों मे भाग लेते रहे

है।

इम प्रकार रामकथा आज से नही सहन्नों लाखों वर्षों से विश्व में व्याप्त हो

गयी है। ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तमराम को ऐसिहासिक पुरुष मानकर उपन्यास के काल्पनिक पात्त मानना परम हास्पास्पद है राम सूं वश--विभूषण, दशरथनन्दन

अर

कौशल्पातन्दवर्धन, अयोध्याधिपति, सीता स्वस्व, भरत-लक्ष्मण--शबुष्त के अग्रज और सप्तार की मर्यादा को स्थापित करने वाले ऐतिहासिक महापुरुष है

हमारे परमप्रेमास्पद लिमये णी ने अपनी इस पुस्तक में वाल्मीकीय रामायण के आधार पर जो ऐतिहासिक पुरुषोत्तम राम के तप का दिग्दर्गन कराया है। यह अत्यन्त हो समीचीन है आशा है आधुनिक नवयुवक इस ग्रथ से शिक्षा ग्रहण करेंगे। श्रीराम भगवान के अवत्तार है, इससे तो भगवत्‌ भक्त ही आनन्द उठा सकते है, किन्तु राप्त एक मर्थादा पुरुष है, उनके चरित्र श्रवणीय तथा अनुकरणीय हैं। इससे तो मातवमात्र लाभाविन्त हो सकदे हं, फिर वे चाहे किसी भी सम्प्रदाय किसी भी मजहूव, किसी भी पन्‍्य के क्यों हो। आजा है कि हमारे लिमये जी बोर भी ऐसे ही शिक्षाप्रद ग्रेथों का सृजन करके भारतीय भाषा के भडार की श्रीबृद्धि करेंगे / मै उठकी मगत कामता करता हू और आशीर्वाद देता हू कि वे अबने चरित्न को पवित्र रखकर शेप जीवत को भारतमाता की सेवा में समपित करते रहे

इति शुभम्‌

(प्रभुदत्त क्रह्मचारी ) सकीर्त॑न भवन, प्रतिप्ठानपुर, पो० झूसी, प्रयागराण, चैत्र क्ृ० ११॥२०३७ वि०

ज््फ्य

रा

अस्तावना

(हारा--श्री दत्तोपंत ठेंगडी)

श्री विश्ववाथ लिमये हारा लिखित वाल्मीकि के मर्यादा पुरुषोत्तम राम की पाण्डुलिपि देखने का अवसर प्राप्त हुआ अपने प्रावकथन में लिमयेजी लिखते है, "वास्तव में राम जीवन यह मानव की समस्याओं का मानवीय सामर्थ्य के आधार पर निराकरण का अप्रतिम उदाहरण है ।” और लगता है कि यही एक भाव लेकर उन्होंने यह प्रयत्न अगीक्त किया है।

वाल्मीकि रामायण का प्रभाव भारतवाप्तियों के जीवन पर, आचारो पर, विचारों पर, कर्मों पर, ब्रतो पर, नियमों पर तथा कल्पनाओं तक पर बहुत गहरा अकित हुआ दिखाई देता है भारतीय हृदय में पितृ-पूजन के, वधु-भावना के, यति या सती धर्म के, तप-त्याग के, लोकसेवा के, समाज-ततगठन के, लोकसग्रह के, जाति मा देश हित के, स्याय तथा सर्वोत्तम शासन के आदर्श श्रीराम ही माने जाते है। हमारे लिये घामिक दृष्टि से भी शुभ कर्मो के लिए परम पावत प्रतीक वाल्मीकि रामायण भे वणित रामचद्र है

रामायण महाकाब्य आदिकाव्य' भी कहा जाता है। इस काव्य के नायक राम हैं, जिन्हे धर्म का आदर्श तथा मर्यादाओं का मूरतिमान उदाहरण मानकर ही नारद मे वाल्मीकिजी को उनका चरिश्न-चित्रण करने को कहा था। श्रीराम ने पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने तथा धर्म की प्रस्थापना करने के लिये शरीर धारण क्या था, यही उनका व्यवहार भी रहा है। इसी आधार पर लेखक के अनुसार, श्रीमद्भागवत ग्रथ में राम-जीवन वो समस्त मत्मंत्रोक के लिये सा्यदशंक बताया गया है-- मर्त्