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नीति-विज्ञान

अथवा

आवचार-शासत्र

[ मानव-आचार पर वेज्ञानिक विवेचन ]

लेखक-.- शअ्रीयुत बाबू गोवधेनलाल, एम० एु०, बी० एलट० |

व्यय: छ--.-_--

प्रकाशक---- हिन्दी-गन्थ-रत्नाकर-कायोलय, हीराबाग, गिरगाव, बम्बई

आलजनन “जलन ७-क्‍++७+++->++-+->«- + बन जीन जज

श्रावण, १९८० वि० अगस्त, १९२३

अथमाचृतक्ति ] [ सूल्य २५)

प्रकाशकः---- नाथूराम प्रेमी, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-कार्योछथ ,

द्वीराबाग, पोष्ट गिरगाँव, बम्बंई।

मुद्रक--- मंगेश नारायण कुछुकर्णी,. कनौठक प्रेस, 9३४,

ठाकुरद्वार, बम्बई।

जि [0 5६८ छ-्- ण]

|| विषयसूची | |

पूवभास।.. .. «* भूमिका हा 29% बे पहला अध्याय

विषय प्रवेश दुसरा अध्याय

नीतिविज्ञान ओर उसकी उपयोगिता तीसरा अध्याय

नीतिविज्ञानका लक्ष्य भौर अनुसन्धानविधि

था अध्याय

सदाचारका स्वभाव ओर विकास 353 पॉचवों अध्याय

पशुसंसारमें सदाचारकी झलक ... हब छठा अध्याय

१-सदाचार ओर प्राकृतिक चुनाव २-युद्ध, जीवन-संग्राम ओर सदाचार सातवां अध्याय सदाचारकी उत्पत्ति और आवश्यकता सर्वोत्तम वेवाहिक प्रथा आठवों अध्याय सदाचारका प्रचार ... नवों अध्याय नेतिक शिक्षा... दसवां अध्याय मजहब और सदाचार संसारस्वप्न मा बे

938.

३४

जर्‌

१००

११६ १३३

१६१ १७८

१८५१

१९१

२०१ २०१

ग्यारहवों अध्याय

विश्वासका माहात्म्य बारहवों अध्याय

ईश्वरमें सदाचारका आदश हम तेरहवाँ| अध्याय

मनुष्य-हृदयपर मजहबका प्रभाव ... चौदहवोें। अध्याय

पूव अध्यायोंका सिंहावलोकन पन्द्रहवों अध्याय

मजहब ओर सदाचारका ऐतिहासिक

,. सम्बन्ध

सोलछहवों। अध्याय मजहब ओर धर्म ... 2

सतरहदवों अध्याय नतिक धर्म रा डे मनुष्यका स्वभाव... शत

अठारहवाँ अध्याय सदाचार धर्म कप

((

२२७

२७४२

२७५९

२७९

३१०

३४४

३६३२ ३६३

३७४

पूर्वाभास

आचार-नीतैेके सम्बन्धर्में दो कल्पनायें हैं। एकके अनु- सार मनृष्य एक काल्पित ईश्वरकी आज्ञाका पालन करता है; परन्तु क्षण भरके लिए भी यह नहीं सोचता कि उसकी आज्ञा उचित ओर न्यायपूर्ण है या अनुचित और अन्याय-पूर्ण ।........वह किसी कामकों बरा इसलिए समझता हे कि ईश्वरने उसका निषेध किया हे, इसालिए नहीं कि ब॒रा समझकर ही ईअरने उसका निषेध किया हे आचार-नीतिकी यह कल्पना स्वतंत्र विचार पर नहीं, वरन्‌ आज्ञाधीनता पर अधिक जोर देती है यह प्रज्ञाके समीप नहीं, वरन्‌ सजा पानेके भय, तथा प्रस्कार भ्राप्त करनेकी आश्ाके सम्म् अपील करती हे | इस कल्पनाके अनुसार ईश्वर एक सत्राद्‌ है, जितकी इच्छा ही धर्म-व्यवस्था या कानून है, ओर चुपचाप आज्ञा-पालन करना सारे जाविधारियोंका एक मात्र कर्तव्य हें; क्‍्यों- कि मनुष्य ईश्वरके भत्य या गुलामके अतिरिक्त कुछ नहीं हे नकल राम आचारनीतिके सम्बन्धर्में हम लोगोंके विचारोंने पलटा खाया हे | अब लाखों मनुष्य यह विश्वास करने लग गये हें कि जिस वस्तुके द्वारा आनन्द और समृद्धिकी उपलब्धि होती हे वह पूर्ण रूपसे नीत्यनुरूप है और यथार्थ सदाचारका सार या मूल आधार अन्ध भृत्यवत आज्ञापालन नहीं हे | यह मानापसिक गुलामाका फल है | कर्तव्यको देख कर तथा उसे पूर्ण रूपसे अनु- भव कर कर्तव्य-पथ पर चलनेमें ही स्वाधीनता, प्रुषार्थ ओर ओजस्विता है। पिर्फ़ आज्ञा-गालन करनेको हम भत्योचित गुण कह सकते हें; इससे अधिक और कछ नहीं। यथार्थ सदाचरण

स्वतंत्रता और ज्ञानका फल और फूल है ?? “-कनल आर० जी० इंगरसोल

जे पका 2 )-

इस पुस्तकका लेखक वैज्ञानिक या दाशनिक नहीं है और उसे विद्वान या साहित्यिक होनेहीका दावा हूँ तब यह प्रश्न सहज ही उपस्थित होता है कि ऐसी दशामें उसे ऐसे जटिल, विवाद-ग्रस्त ओर गम्भीर विषयपर कलम उठा- नेका क्‍या अधिकार है उत्तरमें विनम्र निवेदन कि इस क्षुद्र पुस्तकका लेखक विचारस्वातन्त्रयको बड़ी मूल्यवान्‌ वस्तु समझता है आर उसकी धारणा है कि प्रत्येक मनुष्यको अपने स्वतन्त्र विचारोंके व्यक्त करनेका पूर्ण अधिकार हैं। संसारके किसी भी विद्वान मनुष्य या धर्मको किसीके विचार-स्वातन्त््यके अपहरण करनेका अधिकार नहीं है। प्रत्येक मनुप्यको जीवनकी समस्याओंपर मनन ओर विचार करनेका जन्म-सिद्ध अख्तियार है | अतएवं लेखकने इस पुस्तककी रचना विद्वान गिने जाने या विवाद खड़ा करनेके उद्देशसे कदापि नहीं की है उसने केवल अपने मनोगत भावोंको लिपिवद्ध करनेका प्रयत्न किया है बहुत समयके अध्ययन और चिन्तनके द्वारा वह जिन नतीजोंपर पहुँचा है वही इस पुस्तकमें क्रमवद्ध रीतिसे लिख दिये गये हें

विचारके क्षेत्रमें मोलिकता एक अति ही दुष्प्राप्य वस्तु हैं। मोलिकसे मोलिक विचारोंके पीछे भी पूवकालीन पुरुषोंके अस्पष्ट विचार-- शताब्दियोंके अविश्रान्त चिन्तन ओर प्रयास---अवश्य विद्यमान रहते हैं और प्रत्येक विचारक युगयु- गान्तरके चिन्तनों आर संचित अनुभवोंसे अवश्य लाभ उठाता है। इस दृष्टिसे संसारका कोई भी विचार पूर्णतः मौलिक या नया नहीं कहा जा सकता संसारका इतिहास क्रम-वद्ध विकास या उन्नतिका इतिद्वास है ओर कोई भी वज्ञा- निक पूर्वापरके सम्बन्धकों अस्वीकार नहीं कर सकता प्राचीन समयके मनुष्य पत्तों ओर बृक्षोंक्ी छाठकी पोशाक पहिनते थे; परन्तु आजके सभ्य ओर 'फैशनग्रस्त' मनुष्य तरह तरहके वल्नों ओर परिच्छदोंसे अपने शरीरको ढेंकते हैं क्या यह किसी भी प्रकार अस्वीकार किया जा सक्रता हे कि तुच्छ ओर सामान्य ब्ल्कल-वद्नोंसि ही वर्तमान सभ्य मनुष्योंके विषिध प्रकारके परिच्छदोंका विकास हुआ हे ? इसी प्रकार असभ्य जंगली मनुष्योंके सामान्य नरकट या बाँसके बाजोंसे इसराज या तानपूरेकी उत्पत्ति हुईं है। नदीमें तैरने-

१०

के

वाली छोटी छोटी डोंगियोंसे प्रक्षब्ध महोदर्विमें स्वच्छन्दतापूवक विचरण करनेवाले बड़े बड़े जहाजोंका जन्म हुआ है। पशुओंकी खाल या मिद्टीकी तख्तियों पर लिखी जानेवाली पुस्तकोंके गरभसे ही इस समयके महान्‌ प्रेसों या यंत्रालयोंका अवतार हुआ है इसी प्रकार पूर्व समयके तुच्छ और सामान्य विचारकोंके अस्तित्वके कारण ही संसारमें बुद्ध और क्ृष्ण, स्पेन्सर और डार्विन प्रभति लोग जन्म ग्रहण कर सके हैं इनकी मौलिकता इनके विचारोंके नये- पनमें नहीं, वरन्‌ इनकी स्पष्टता, इनके अध्यवसाय, ओर वर्णित बातोंपर स्वयं इनके निश्चल विश्वासमें ओर अपने विचारोंके मध्य तह्नीन हो जानेमें है

लेखक इस पुस्तकके लिए इस दर्जेकी मोलिकताके दावा करनेका दुःसाहस नहीं कर सकता तौमी अपने तुच्छ विचारके अनुसार वह इस पुस्तककों मोलिक अवश्य कह सकता है यद्यपि उसके विचार एकदमसे नवीन नहीं ईं, तथापि वे लेखकके अपने और स्वतंत्र विचार हैं और लेखक उन्हें सत्य समझता है | लेखकने दूसरोंके विचारोंको भी चिन्तन और मनन द्वारा अपना बनाया है और यही लेखककी मौलिकता है

जहाँ तक लेखक समझता है इस विषय पर हिन्दीमें एक भी पुस्तक नहीं है अँगरेजीमें भी इस ढंगसे लिखी गईं कोई पुस्तक उसकी नजरोंसे नहीं गुजरी अँगरेजी पुस्तकें योरोपीय परिस्थितियोंको नजरमें रखकर लिखो गई हैं, अतएव वे भारतोय परिस्थितियोंके साथ पूर्णतया कदापि लागू नहीं हो सकतीं वर्तमान पुस्तक किसी एक पुस्तकके आधार पर नहीं लिखी गई है, वरन लेखककों इसके लिए वहुतसी पुस्तकोंका अध्ययन करना पड़ा है ज्ञानतः लेखकने जितनी पुस्तकोंसे सहायता ली है उनका वर्णन उसने स्थल स्थल पर ग्रन्थके भीतर ही कर दिया है; परन्तु अज्ञात रूपसे लेखककों कितनी ओर किन किन पुस्त- कोंसे सहायता मिली है यह कहना उसके लिए भी कठिन है सब कुछ स्वीकार करने पर भी लेखक शायद इस पुस्तकके कुछ अंशोंको--विशेष कर अन्तके कई अध्यायोंको-मौलिक कह सकता है ओर इसके लिए पुरस्कार या तिरस्कारका भागी केवल लेखक ही है

पहले ही निवेदन किया जा चुका हे कि लेखक विद्वान्‌ या साहि- त्यिक होनेका दावा नहीं करता इसी लिए इस पुस्तककी रचनाशैली और भाषा दोनों साधारण हैं लेखक साहित्यिक नहीं हैं, इसलिए उसकी भाषा साहि - त्यिकोंको नापसन्द हो सकती है और वे इसे नीरस आर सौन्दय्य-रहित भी अनु-

हर

मान कर सकते है। अतएव यदि साहित्यिकों और विद्वानोंकी यह धारणा हो, तो इससे लेखकको कोई दुःख होगा क्योंकि वह तो भाषाका पण्डित है ओर साहित्यका मर्मज्ञ, इसलिए उसने भाषाके सौन्दस्यकी अपेक्षा स्पष्टता पर कहीं अधिक ध्यान रक्‍्खा है भाषा साहित्य या कविता पर भी लेखक अपने कुछ स्वतंत्र विचार रखता है, परन्तु यहँ। पर उनके वर्णन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है साहित्यिक चाहे जो कुछ कहें, लेखक तो यही समझता है कि भाषाका उद्देश केवल भावोंका व्यक्त करना है ओर जिस भाषाके द्वारा भाव अच्छी तरहसे व्यक्त किये जा सकें वही भाषा उत्तम: है इस पुस्तकमें लेखकने आद्योपान्त अपने इसी सिद्धान्त पर चलनेकी चेष्टा की हैं। इसी लिए साहित्यिक नियमोंके विरुद्ध उसे स्थल स्थलूपर एक ही बातको बदले हुए शब्दोंमें दो दो तीन तीन बार भी लिखना पढ़ा है

अन्तमें वह अपने सभी पाठकों और समालोचकोंसे क्षमा और निष्पक्षताकी प्रार्थना करता हैं। मतभेद बुरी वस्तु नहीं है--क्योंकि भिन्नता, असाहश्य या नानात्वमें ही जीवनका स्वाद हँ--किन्तु दूसरोंके मतोंपर बिना विचार किये, प्रमाणोंपर बिना कुछ भी ध्यान दिये--- अपने मतसे विरुद्ध अन्य सभी मतोंकी उपेक्षा करना अवश्य बुरी वस्तु है। लेखककी कदापि यह इच्छा नहीं है कि सब लोग उसीके सदृश सोचने लग जायें; बल्कि वह यह चाहता है कि सब लोग स्वतंत्रतापूवंक विचार कर सकें लेखक जितना मूल्य अपने स्वतंत्र विचारोंका समझता है उतना ही दूसरोंके स्वतंत्र विचारोंका भी समश्षता है और इस कारण उनका यथेष्ट आदर करता है

इस पुस्तकको लिखे हुए कई वर्ष हो गये। पुस्तक लिखनेका निश्चय तो लेखकने बहुत पहले कर लिया था, परन्तु उसका आरम्भ सन्‌ १९१८ में हुआ ओर १९२० में वह प्रायः पूरी हो गई प्रकाशकसे पुस्तकके प्रकाशित करनेकी बातोंको ते हुए भी प्रायः दो वर्ष हो गये और अब १९२३ में यह पुस्तक अनेक विप्न वाधाओंको ते करके संसारके प्रकाशमें पदार्पण कर रही है लेखक- को विश्वास नही होता कि इस पुस्तकका अच्छा स्वागत होगा, तथापि कर्तव्यपा- लन समझ कर ही वह इस पुस्तकको--अपने विचारोंकों जो अनेक समयसे उसके मस्तिष्कमें हलचछ मचा रहे थे--संसारमें भेजनेका साहस कर रहा

है।न तो उसे पुरस्कारकी आशा है और तिरस्कारका भय वह सर्वथा उदासीन हे

१२

लेखक यह कदापि नहीं समझता कि यह पुस्तक रत्नरूपसे मातभाषाके मुकु- टमें जटित होकर माताकी शोभाषद्धि कर सकेगी, तोभी यदि मातृभाषाके पुजारी इस पुष्परूपी तुच्छ पुस्तकको माताके चरणों पर स्थान पानेके योग्य समझेंगे, तो लेखककी प्रसन्नताकी कोई सीमा नहीं रहेगी

पाठकों ओर समालोचकोंसे लेखक केवल यही भिक्षा चाहता है कि पुस्तकको एक बार आशद्योपान्त पढ़े बिना वे इसके सम्बन्धमें कोई राय कायम कर लें।

सबसे अन्तमें लक्ष्मी, प्रभा ओर माधुरीके सम्पादकोंके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना भी लेखककऊा कर्तव्य है। इस पुस्तकके अनेक अंश लक्ष्मी ' के पृष्ठोंमें और “युद्ध, जोवन-संप्राम ओर सदाचार तथा सदाचारकी उत्पत्ति और आवश्यकता ' शीर्षक अध्याय “माधुरी ' और प्रभा ' में प्रकाशित हो चुके हैं प्रकाशनके पूर्व ही उन्हें इस पुस्तकमें सम्मिलित करनेकी अनुमति देनेके लिए लेखक उक्त सम्पादकोंके प्रति अपनी हार्दिक क्ृतज्ञता प्रकट करता है। विशेष कर लेखक अपने मित्र बाबू रामानुग्रहनारायणलाल बी० ए० का बढ़ा कृतज्ञ है। लेखकके परिभ्रमके साथ उन्होंने जो ज्रेह दिखलाया हे उसके लिए लेखक उनका चिर ऋणी रहेगा उन्होंने ही अनुरोध करके इसके खण्डोंको लक्ष्मीमें प्रकाशित किया ओर प्रन्थके समाप्त हो जाने पर उन्होंने ही लेखककों इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करानेके लिए उत्तेजित किया बिना उनके उत्साह- वद्धनके शायद इस प्रन्थका जन्म ही होता

यहाँ पर यह कहना बहुत जरूरी प्रतीत होता है कि लेखक ओर प्रकाशकके मध्य सेकड़ों कोसोंका अन्तर रहनेके कारण, बहुत कुछ सावधानी रखते हुए भी, यदि पुएतकमें कुछ अर्शैद्धियाँ रह गई हों, तो पाठक उनपर ध्यान देंगे ओर कृपया उन्हें सुधार छेंगे। अन्तमें विद्वान्‌ प्रकाशकके प्रति भी अपनी कृतज्ञता प्रकट करके लेखक इस भूमिकाको समाप्त करता है। प्रकाशकने कहीं कहीं पर उचित सम्मतियों देकर, संशोधन करके एवं ध्यानपूर्वक इस पुस्तकको प्रका- कित करके लेखकके ऊपर जो ऋणभार रक्‍्खा है उससे मुक्त होना उसके लिए असम्भव है

गया- | जुलाई, १९२३। | -गोवद्धेनछाल

नीति-विज्ञान थक गा जोक का न््ध्््् अचि-चजे्े

पहला अध्याय _«० [80 »«- विषय-प्रवेश

नि सदक कफ

बहुत दिनोंकी जड़ावस्थाके बाद हमारे देशमें जागृतिके लक्षण दीख पड़ रहे हैं। चारों ओरसे पुकार उठ रही है कि अब सोनेका ज़माना गया, अब हमें कर्ममें रत होना चाहिए केवल तर्क वितर्कसे काम चलेगा | इस समय हमारा उद्धार दशनशात्रके द्वारा नहीं वरन्‌ साधनसे होगा | निस्सन्देह हम केवल ऐसा कहते ही नहीं हैं वरन्‌ हम कुछ कुछ काममें लग भी गये हैं

स्वभावतः पाठकवर्ग मुझसे प्रूछ सकते हैं कि ऐसे समयमें भी नीतिशात्रकी महत्ता समझानेसे क्या छाभ होगा एक तो भारत स्वभावसे ही ध्यानशील और संसारसे उदासीन है, इस पर भी उसे ध्यानस्थ बनानेका प्रयत्न क्यों कर रहे हो ? मेरा उत्तर बहुत साधारण है। ज़रा भी सोचने पर यह स्पष्ट हो जायगा के विचारसे ही कर्मोंकी उत्पत्ति होती हे | बिना विचारके कर्म सर्वधा असम्भव हे संसा-

विचारका महात्म्य

नीतिनविजश्ान |

रकी यह सारी भौतिक उच्नति भी विचारका ही फल है वैज्ञानि- कोंके अहानाशे चिन्तन करनेसे ही यह मुझे प्राप्त हुआ है यदि वे रात दिन कठिन परिश्रम करके और अपने सरको खपा कर प्राकृतिक नियमोंकी जानकारी प्राप्त करते तो आज संसार इतना उन्नत कहाॉँल होता £ काय्येके पहिले विचार ही जन्म ग्रहण करता है। ग्रत्येक कामके करनेके पहले हमारे सनमें उस कामके करनेका खयाल ही पेंदा होता है उसी ख़याछको हम कार्य्यमें परिणत करते हैं। मान लो कि हम अपने घरसे अपने मित्रके यहाँ जाना चाहते हैं, तो अब यदि प्रत्येक पग पर यह खयाल हमारे मनमें रहे, तो क्या हम अपने मित्रके यहाँ पहुँच सकते हैं ? क्या बिना इस खयालके हम एक क्रदम भी बढ़ा सकते हैं ? विचार या ज्ञान, विश्वास या धारणा ही सब कुछ है | यह ठीक है क्लि अक्सर हमारे विचार हमारे मस्तिष्कमें सोया करते हैं, कुछ बाह्य कारणोंसे हम उन्हें व्यवहारमें नहीं लाते हैं या कभी कभी हमें उनके विरुद्ध भी कुछ काम करना पड़ता है। परन्तु ऐसी अवस्थामें भी ये विचार एकदम बेकार नहीं बैठे रहते | ये भविष्यके लिये संचित रहते हैं। ये ही भविष्यमें हमारे कार्य्यैके अनुशासक बनते हैं। ये विचार सलाईमें अग्निके समान छिपे रहते हैं और अवसर पते ही एकाएक प्रज्वल्ित हो उतठते हैं, बमगोलेके समान फट पड़ते हैं और अक्सर बहुतसी चीजोंको भस्मी- भूत भी कर डालते हैं। बड़े बडे आन्दोलनों और विप्लवोंकी आकस्मिक उत्पत्ति इसी ग्रकार होती है। पुनः ये मूक विचार अपने उपयुक्त वायुमण्डलकी रचनामें कहाँ तक समर्थ होते हैं, यह तो स्पष्ट ही है। हम ख़ुद शायद कार्य्यमें प्रइत्त हों, परन्तु हमारे मूक 'विचारोहीसि उन काम करनेवालको कितनी सहायता मिलती है

विषय-प्रवेश

जिनके विचार हमसे मिलते हैं | हाथ पकड़ कर हम उनकी सहायता भी करें तौभी केवल मात्र उनके पथमे हमारे किसी बाधाके रखनेसे क्या उनका कम उपकार होता है ?

अपने विचारोंहीके कारण मनुष्यने देविक और पेशाचिक दोनों प्रकारका काम किया है। उसने संसारहितके लिए अपना प्राण तक परित्याग किया है। अपने विचारोंहीके कारण उसने देश विदेश विजय किये हैं, बच्चों और ल्लियोंको अग्निके हवाले किया है तथा काफिरों और अविश्वासियोंकी हत्या की है।

ज्ञानका माहात्म्य अनन्त है। हमारा प्रत्येक कार्य ज्ञानका ही नतीजा है प्रय्येक काम ज्ञानरूपी बीजका ही फल और फ़ूल है। अज्ञान ही सारे दुःखों और क्लेशोंका कारण है। प्राकृतिक नियमोंके जाननेके कारणसे ही मनुष्य अनेकों दुःख झेलता है। उदाहरणके लिए आप बीमारियों- हीको लीजिए क्‍या प्रायः सभी बीमारियोंकी जड़ हमारा अज्ञान नहीं है ? यदि हमें जीवनके सभी नियम प्रूर्णत: माद्ूम होते---यदि हमें खाने पीने या रहने सहनेकी उत्तम रीति माछूम होती---तो क्या हम सहजमें ही इतनी बीमारियोंके लक्ष्य बन सकते ? इसी कारण हमारे शास््रोंने ज्ञाकको इतनी महत्ता दी है और अज्ञानको समस्त दुःखोंका कारण ठहराया है

तब क्या ज्ञानका वह अंश जिसके द्वारा मनुष्योंके परस्परका कतेंब्य

स्थिर होता है एकदम व्यर्थ है? नीतिशाखत्न सदाचरणका की शासत्र है। यदि हमें हर बातमें ज्ञानकी इतनी आवश्य- कता है तो क्‍या हमें इस शाखत्रकी कोई ज़रूरत नहीं !

क्या हमें नीतिके स्वरूप और उत्पत्तिके सम्बन्धमें कुछ भी जानने-

जानकी आ- चश्यकता

नीति-विशान

की कोई जरूरत नहीं ? प्रकृति हमें सचरित्र बनाना चाहती है या दुश्चरित्र, विना मज़हबके भी सदाचार सम्भव है या नहीं, हमारे हृदय- में सदाचारकी कोई स्वतन्त्र प्रद्मति है या नहीं, हमलोग स्वर्ग या नरककी छारूच या भयसे ही सत्कर्म करते हैं, या और किसी कार- णसे, उत्तम और नैतिक घिरावके पैदा करनेसे संसारका दुःख कुछ मेटा जा सकता है या नहीं, इत्यादि प्रइनोंका उत्तर क्या हमारे लिए सर्वतः उदासीनताकी बात है ? मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक जानवर है। मनुष्यकी सारी कामनायें समाजके द्वारा ही पूरी हो सकती हैं। समाजके बिना वह एक क्षण भी न्‍जीता नहीं रह सकता समाजमें रहने पंर ही उसके स्वभावका पूणे विकाश हो सकता है---उसकी प्रूर्ण उन्नति हो सकती है। अतरव उसे सबसे अधिक समाज-विज्ञान जाननेकी आवश्य- कता है और विशेषकर उसके लिए नीति-विज्ञान या सदाचार-शाब्नका जानकारी परमावश्यक है | साधारणत: सभी बातोंमें ज्ञानका माहात्म्य स्वक्वित हो चुका है ? परन्तु तौभी नेतिक जीवनमें ज्ञानका एकाधिपत्य नौतिके क्षेत्र; अभी तक किसी देशमें नहीं हुआ है | छोगोंका हि विचार हे कि इसमें मज़हब # के अखण्ड साम्नाज्यको ज्योंका त्यों छोड़ देना चाहिए; नेतिक बातोंमें तर्क वितककी कोई आवश्यकता नहीं। इससे लछाभके बदले हानि ही अधिक

* में जान बूझ कर धर्म ' शब्दके बदले अरबीके मजहब ' शब्दका प्रयोग कर रहा हूँ, क्योंकि मेरी समझमें धर्म ' और मजह॒ब ' में बड़ा अंतर है और हमारे वर्तमान धार्मिक विचारोंके लिए " मजहब ' शब्द ही अधिक उप- युक्त हैं ( दखो अध्याय पन्द्रहवों )

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विषय-प्रवेश ५५

होगी | हमारे देशके छोग इसी कारण अँगेरेजी शिक्षा तथा वेज्ञा- निक रिक्षाके विरुद्द हैं ओर कुछ छोग जो इन्हें आवश्यक समझते भी हैं तो वे मी यह जरूर चाहते हैं कि वैज्ञानिक शिक्षाके साथ साथ मजहबी शिक्षा भी अवश्य दी जाय ताकि हमारे आचार ढीले पड़ने पावें परन्तु यह विचार सर्वतः श्रम-मूछक है। नीतिके क्षेत्रमें भी ज्ञानकी ज्योतिकी कम आवश्यकता नहीं | ज्ञान ही कर्तव्याकर्त- व्यका फेसला कर सकता है, अन्धविश्वास कदापि नहीं परन्तु मजहबकी स्थिति ज्ञान पर 'हीं वरन्‌ अन्ध-विश्वास पर है मजहब अपनी आशज्ञाओंके छिए बुद्धिग्राह्म 24420 युक्तियाँ नहीं बतछा सकता | यहाँ हमें धर्मग्रन्थों, प्कार और. धरके कहे हुए वाक्यों, तथा पुजारियोंके आदेशोंका उसका कुप- सहारा लेना पड़ता है। और जब ज्ञानका इस ग्रकार रिणाम वहिष्कार होता है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे कार्य्य भी ज्ञानसे शून्य तथा पशुवत्‌ होते हैं इसी ज्ञानके वहि- व्कृत होनेके कारण हम मजह॒बोंके आदेशज्ञोंगें ओर मजहबी लोगोंके आचरणमें इतनी विरुद्धता पाते हैँ। अन्धविश्वास पर स्थित होनेके कारण ही, नेतिक सिद्धान्तोंकी मानते हए भी, मज़हब इन पर व्यव- हार नहीं करता ईश्वरकी एकता तथा मनुष्यजाति मात्रके भ्रातृववकों मानते हुए भी मजहबने असंख्योंका खून किया है--इतने छोगोंकी हत्या की है कि जिनकी हड्डियाँ एकत्रित होने पर संसारके सभी मौना- रॉसे ऊँची हो जायैंगी---छोगोंको इतनी यंत्रणा पहुँचाई है कि जिसके सामने मज़हब-कल्पित नरक ”की भी यातनायें शायद फीकी पड़ जायैंगी---अहिंसावादी होने पर भी मज़हबने इतने लोगोंके सुख शान्ति और आरामको बलात्कार छीन लिया है तथा उनके चित्तको

ध्द नीति-विज्ञान

समशान बनाया है कि वह सर्वथा कल्पनातीत है | मज़हबने सदा ज्ञानका पथावरोध किया है--अपनी अवस्थाके बदलनेकी कोशिशमें मनुष्यके साथ शत्रता की है और संसारकी उन्नातिकों पूर्ण बठके साथ रोका है |

हम अपने मज़हबाच्छन्न देशके सम्बन्धमें क्‍या कहें, योरोपमें भी जहाँ कि मज़हबका प्राबल्य एकदम घट गया है हम देखते हैं कि मज़हबकी कुचेष्ठा और अपकार- प्रियता अभी तक समाप्त नहीं हुई है। आज भी हम देखते हैं कि कथोलिक इन्साइकुलोपीडिया---कुछ तो बाइबुरूका सहारा लेकर और कुछ इस बहाने कि अविश्वाससे बड़ी सामाजिक हानि होती है--धार्मिक असहिष्णुताको प्रतिपादित करता है।........ 00078 सितम्बर १९०७ के घोषणापत्रमे ( ९7०ए८टा्वों [४०7 ) बत॑मान पोपने यह प्रकाशित किया है कि “नर्वान विचारके अध्यापक विश्वविद्यालयोंमें बहा किये जायेँ और उनके ग्रन्थोंका प्रचार बन्द किया जाय | %

मजहब और ज्ञान

.” यह सर्वथा स्वाभाविक है, क्योंकि अन्ध-विश्वासपर स्थित होनेके कारण मजहबको ज्ञानका प्रतिरोध करना ही पड़ेगा | ज्ञान ओर मज- हब मित्र कदापि नहीं हो सकते एकको अवनतिसे दूसरेकी उन्नति और एककी उन्नतिसे दूसरेकी अवनति होगी। मजहब ( अर्थात्‌ अन्ध- विश्वास ) और ज्ञान साथ साथ कदापि नहीं चछ सकते 'ज्ञानमें स्वतन्त्रता है और मज़हबमें गुलामी; स्वतन्त्रता और गुलठामीका साथ

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विषय-प्रयेश

किस प्रकार हो सकता है---अन्चकार और आलोक एक ही स्थान- पर किस प्रकार रह सकते हैं ! परन्तु मनुष्यका उपकार ज्ञानके ही द्वारा हुआ हे, यह स्पष्ट ज्ञानले | ज्ञान ही मनुष्यके दुःखोंको हटा सकता हे यह लाभ। स्वयं-पिद्ध हे। ज्ञानके द्वारा मनुष्य ग्राकतिक अभाष- को भी पूरा कर सकता हे ज्ञानके द्वारा वह प्रकृति पर एकाधिपत्य लाभ करता है और प्रकृतिकी शक्तियोंसे दासीका काम छेता है। जरू, वायु, आकाश उसके आज्ञानुवर्ती बनते हैं। बह्ने# इसको पूर्णतया सिद्ध कर दिया है कि योरोपकी उन्नति मजहबके घटनेसे हुई। मज़हबका प्राबल्य जितना घटा उतना ही योरोप उन्नतिकी ओर अग्रसर हुआ जितना ही मज़हबका अन्धकार कम हुआ उतना ही स्वतन्त्रता देवीकी आभा चहुँओर फैडी ।/जब मनुष्यकी मा- नसिक गुठामी जाती रही तब उसकी शारीरिक गुलछामीका भी अन्त हुआ बुद्धिके स्वतन्त्र होने पर मनुष्यने राजनेतिक स्वतंत्रता भी प्राप्त की-स्वेच्छ फेक राजाओंके अप्रतिहत बल और असीम अत्या- चारोंकी इतिश्री हुई | बहकुकी पुस्तकके पढ़ने पर किसीके भी जीमें सन्देह रहेगा कके ज्ञानके द्वारा ही छेशोंसे हमारी मुक्ति हो सकती है। मज़हब ओर ज्ञानका एकं स्थानमें रहना असम्भव है। भोजन कौन करता है ? वही जो भूखा है। इसी प्रकार ज्ञानोपार्जन मजहबको आव- दे या है जो ज्ञानका भूखा है--जो ज्ञानसे तृप्त शानकी आव- हों हे इयकता नहीं “हीं हुआ है---जो समझता है कि वह कुछ नहीं है जानता तथा उसे बहुत कुछ सीखना है। मज़हब यह समझता है कि उसे सभी विषयोंका ज्ञान प्राप्त है और

.. देखो छपर०व०3 पांडणज टांसीड्बपं०्म ए. पता50फ एारस[[इथांणर सिद्वेग्गत-लप्रा- एणा8४५१ ४6070 १४०70'5 0]४5७०५ 5९7653 ४०४,

नीति-चघिशान

मज़हबके अनुयायी मज़हबकी बातोंको साक्षात्‌ परमात्माकी बात समझ कर माननेके लिए बद्ध हैं | शंकाका यहाँ कोई स्थान नहीं है परमात्मा क्या झूठ बतछा सकता है ! वह भी क्‍या मूर्ख हो सकता है! यदि कोई शंका कभी धीमेसे विद्यमान हुई भी, तो मज़हबी आदमी शीघ्र इसे पाप समझ कर दबानेकी चेष्टा करता है; परन्तु तर्क शंका ओर अन्वेषणसे ही ज्ञानकी प्राप्ति होती है। सारांश यह है कि मज़- हबी आदमीको कोई ज्ञान सीखना नहीं है, वह सब्र कुछ जानता है।

मनुष्यकी सृष्टि किस प्रकार हुईं ? क्यों यह कौनसी मुश्किल बात है | शेषशायी भगवानके कमल-नाल्से ब्रह्मा उत्पन्न हुए और ब्रह्मा- हीने मनुष्य जातिकी उत्पत्ति की | क्‍या बाइबुल और कुरान यह साफ साफ नहीं कहते कि प्रायः छः हज़ार वर्ष हुए कि खुदाने छः दिन तक कड़ी मेहनत करके इस संसारकी और सब जीवोंकी रचना की थी और सातवें यानी इतवारंके दिन जरा सुस्ताये थे ? वर्षी किस प्रकार होती है? यह भी कोई बड़ी बात नहीं है। इसे वरुणदेवकी ऋपा या क्रोध ही समझो | क्‍या सूर्य्य और चन्द्रमा घूमते हैं या पृथ्वी धरूमती है ? यह भी साधारण ही प्रश्न है | क्या रामचन्द्रजीके जन्मके समय सूय्य, और श्रीकृष्णके रास करनेके समय चन्द्रमा, एक ही स्थानपर महीनों तक खड़े नहीं रहे थे ? जातियोंकी उत्पत्ति किस प्रकार हुई? यह भी कोई कठिन सवाल नहीं है, क्योंकि यह कौन नहीं जानता कि ब्रह्माके मुखसे ब्राह्मण, बाहुसे क्षत्रिय, जंघासे वैश्य तथा चरणोंसे झूद्र उत्पन्न हुए हैं ? छोग बीमार क्‍यों पड़ते हैं? ईसाई मजहन्र साफ कहता है कि प्रेतोंके शर्रारके अन्दर घुसनेसे व्याधिसे छुटकारा किस प्रकार मिल सकता है ? देवताओंके प्रसन्न करनेसे, पूजा-पाठ, जप, ब्राह्मण-मोजन इत्यादेसे ( चलिए अब चिकित्सा-

विषय-प्रवेश ९,

शासत्रकी कोई आवश्यकता शेष रही ) में गरीब क्‍यों हूँ, कामोंमें मुझे सफलता क्यों नहीं होती ? यह मेरे खोटे प्रारब्धका दोष है। धनोपाजनके लिए पुरुषाथ ओर अध्यवसायकी ज़रूरत नहीं मुझे आज एक अत्यन्त ज़रूरी कामके लिए कलकत्ते जाना था, परन्तु समय पर स्टेशन पहुँच सका, गाड़ी खुल गई | क्या किया जाय क्रिस्मतहीमें गाड़ी छुटना लिखा था। अधिक उदाहरण कहाँ तक दिये जायें तात्पर्य यह है कि जब तक अन्ध-विश्वास बना रहता है तब तक ज्ञान पदारपण नहीं कर सकता ।(मज़हबके घटनेहीसे मजहबसे थयोरोपकी तीनों बड़ी भूलें निवासित हो सकी हैं। हानि। प्रथम भूलके कारण राजनीतिमें आत्मबलकी अपेक्षा शासकगणपर ही अधिक भरोसा रखा जाता था। द्वितीय भूछके कारण विज्ञानके नामसे लोग अनहोनी बातोंमें विश्वास करते थे। तृतीय भूलके कारण छोग धर्ममें अत्यन्त हिंसक स्वभावके थे | »% बकुने यह भी प्रमाणित कर दिया है कके मजहबका एकाधिपत्य जिन देशोंमें जितना ही अधिक समय तक रहा है वे सम्यतामें उतना ही अधिक पीछे पड गये हैँ | उसने सोलहवीं शताब्दीके इईँग्लेणए्ण और फ्रांसकी इस प्रकार तुलना की है-““ अँगरेज़ोने अपने ध्यान और बुद्धिको ऐहिक बातोंमें लगाया जिसका नतीजा यह हुआ कि सोलहवीं शताब्दीके अन्त तक उन्होंने एक ऐसा साहित्य पैदा कर डाछा कि जिसकी मृत्यु कदापि नहीं हो सकती | किन्तु फ्रांस इस समय तक एक भी ऐसी पुस्तक निकाल सका था कि जिसके नष्ट हो जानेसे

+ 30०06 5 लां509 ०ए (एाशं।242007 ४०), 7 ?., 27. प्रत्येक भारतवासीको यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।

१० नीते-विशज्ञान

योरोप दरिद्व हो सकता है एक बात और भी है--फ्रांसमें सम्य- ताने कहीं पहले जन्म ग्रहण किया था; देशकी आधिक अवस्था पहले ही उन्नत हो चुकी थी; इस देशकी भौगोलिक स्थिति इसे योरोपीय विचारका केन्द्र बना रही थी और इसने उस समय साहित्यकी ओर ध्यान दिया था, जब कि हमारे पूथंज एकदम मूर्ख और असम्य जंगली थे

“४ साधारण उत्तर यही है कि कोई देश तबतक उन्नति नहीं कर सकता जब तक वहाँ मज़हबका प्राबल्य बना रहता है ।........ सिफ़ बुद्धिविषयक बातोंहीमें यह हालत नहीं है |(मज़हबका एकाधिपत्य जब तक बना रहेगा तब तक किसी देशकी भौतिक और नेतिक अव- सथा भी शोचनीय ही रहेगी, क्योंकि मज़हबके रहते सहानुभूतिका उत्पन्न होना असम्मव है %)

योरोपके सभी देशोंकों अपेक्षा स्पेनमें मज़हबका प्राबल्य कहीं अधिक रहा है और इसी कारण स्पेन सम्यतामें सभी योरोपीय देशोंसे आज तक पीछे है। मजहबसे पूर्णत: जकड़ जाने पर थोड़े ही दिनोंमें स्पेनकी क्‍या दुरदशा हुई, यह अत्यन्त ही शिक्षाप्रद है।

बक्क कहते हैं कि सतरहवीं शताब्दीके आरम्ममें ( यानी चतुर्थ फिलिप और द्वितीय चार्द्सके राज्यके पहले ) मैड़िडकी आबादी चार लाख थी और अठारहवीं शताब्दीके आरम्ममें वह घट कर दो राख हो गई सोलहवीं शताब्दीके अन्दर सोविछ शहरमे सोलह हज़ारसे ज्यादे करधे थे और उनमें एक छाख तीस हज़ार आदमी काम करते थे | चतुर्थ फिलिपके राज्यमें इन सोलह हज़ार करघोंके स्थान पर

* [७, ७०. ॥.79. 7--8

विषय-प्रवेश ११

तीन सोंसे भी कुछ कम ही शेष रह गये थे सोलहवीं शताब्दीके मध्य टोलेडो शहरमें पचाससे अधिक ऊनके कारखाने थे १६६५ में वहाँ सिर्फ़ तेरह कारखाने जीवित रह गये थे टोलेडो अपने रेशमी वदच्धेकि लिए मशहूर था, परन्तु यह व्यवसाय भी नष्ट हो गया सतरहवीं शताब्दाके आरम्भ तक स्पेन अपने दस्तानोंके लिए प्रसिद्ध था और वे बहुत देशोंमें भेजे जाते थे। परन्तु यह व्यवसाय भी सतरहवीं शताब्दीके मध्य तक एकदम गायब हो गया ।.......- इग्लेंण्टका एक मंत्री स्टैेन होप जो १६९०९ में स्वेनमें रहता था लिखता है कि एक भी ऐसा दिन नहीं गुजरता |कि अन्नके लिए लड़ाई करके लोग सड़कों पप मरते हों।” १६७९ में एक लेखकने लिखा है कि मज़हबी किताबोंके सिवा अन्य सभी ग्रन्थ एकदम व्यर्थ समझे जाते थे अठारहबीं शताब्दकि मध्य तक मेड़िड- में एक भी पुस्तकाछय था। स्पेनकी सबसे प्रसिद्ध सेलेमैन्का यूनिवर्सिती सन्‌ १७७१ तक निउटठन ( ४०४७४०॥ ) के आविष्कारों- को पढ़ानेसे इनकार करती थी | उसका कारण यह था कि ये बाइ- बुलके विरुद्ध थे | डयूक डी सेण्ट साईमन---जो सन्‌ १७२१ और १७२२ में फ्रांससकी ओरसे स्पेनमें दूत होकर गया था-कहता है के स्पेनमें विज्ञान पापमें और मूर्खता पुण्यमें शामिल है ।........ १७६० में कुछ साहसी राजकमचारियोंने यह राय जाहिर की कि मैड्िड ( ४०्ठांत ) की सड़कोंकी सफाईका प्रबन्ध किया जाना चाहिए इतनी बड़ी धृष्टतासे छोगोंकी कोपाप्नि भड़क उठी। ऐसिर्फ मूखे लोग "ही नहीं बल्कि पढ़ेलिखे ठोग भी भयानक प्रतिवाद करने लगे। गवनंमेण्टने डाक्टरोंसे राय छी। उन्होंने भी निःसह्लोच राय दी कि गर्देको हटाना चाहिए। ऐसा करना गोया नये रास्ते पर चलना ठहरा

श्२ नीति-विज्ञान

उनके पूव॑ज सदा ग्द और गन्दगीमें रहे तब वे क्‍यों नहीं रह सकते हैं ? उनके पूर्वज निःसन्देह बुद्धिमान थे और निष्कारण ही वह गर्दमें नहीं रहते थे नहीं नहीं, छोगोंके लिए दुर्गन्‍्धकी शिकायत करना भी फजूल ही था, इससे भी वैज्ञानिक छाभ ही होता था। अतः स्पेनके सभी डाक्टरोंने सहमत होकर यह राय ही कि गर्दे और कूड़ेको ज्यों- का त्यों छोड़ देना चाहिए ।........फ़र्द खोलने और जुलाब देने- हीको स्पेनके डाक्टर प्रत्येक बीमारीके लिए परमोषध समझते थे ये सभी बीमारियोंके लिए अचूक अख््र थे #%

धार्मिक इढ़तामें योरोपके देशोंमेंसे स्कोटलैण्ड ही कुछ कुछ स्पेन- का सामना कर सकता है। स्कोटलैण्डमें भी अन्य देशोंकी अपेक्षा बहुत दिन तक मज़हबका साम्राज्य बना रहा है। फरूत: सभ्यतामें स्कीटलेण्ड भी बहुत पाछे रहा है + स्कीटलेण्ड अब तक भी परूर्ण- ताके साथ मज़हबसे अपना पिण्ड नहीं छुड़ा सका है। वहाँ धार्मिक असहिष्णुता---धामिक हिंसकता---अभी तक प्रबल रूपसे विद्यमान है स्कीटलैंडनिवासी अभी तक विश्वास करते हैं ॥कि सिवाय कुछ चुने हुए आदमियोंके समस्त मनुष्यजाति नरककी भागिनी होगी। प्राचीन मज़हबम अब तक बहुत बल शेष है। अतएब लोगोंका जीवन निराशासे पूर्ण है साधारणसे साधारण और एकदम निर्दोष दिल- बहलाव भी बुरा समझा जाता है। मज़हब अब तक भी जीवनको उमशान बनानेकी चेष्टामें छगा है। स्कीटलेण्डकी मानसिक पराधीनताका पता इस घटनासे पूरे तौर पर चल जाता हैं। सन्‌ १८५३ में

निज तन तजजन न्‍. >>++न_-_-_+-०५७«-++-००००““---++----+-+-++++२०न्‍न्‍््न्-__

* [0, ४०). ए., 97. 400-447- + 79, ४०0 77 979 787-682. बक्ककी पुस्तक सन १८५७--६१ में लिखी गई

विषय-प्रवेश। १३

स्कोटलेण्डमें हैजैकी बीमारी प्रबल रूपसे फेल गई दरिद्वोंको भर पेट भोजन कराने, अपनी नालियोंको साफ कराने, कूड़े ओर गर्देका बहिष्कार करानेकी अपेक्षा यहॉँंके छोगोंने यह स्थिर किया कि इस बामारासे बचनेके लिए उन्हें एक ऐसा दिन नियत करना चा- हिए कके जिस दिन समस्त स्कीच जाति भूखी रहे और उपदेशक लोग खूब उपदेश दें तथा मनुष्योंका ध्यान पापकी ओर आदक्ृष्ट करें | इस तरह लोगोंको फिटकारने और उनकी निन्दा करनेसे ईंश्वरके प्रसन्न होनेकी सम्भावना थी और इसी तरह बीमारीसे छुटकारा मिल सकता था, अन्य उपायों द्वारा नहीं | % सभी विज्ञानोंकी मूलाभेत्ति ब्यात्तिवाद ( [70प८४०णा ) है। अत- एवं अन्य विज्ञानोंकी तरह नीतिविज्ञानको भी व्यापि- सम्यत्यम वादकी नीवपर स्थित होना चाहिए | इस कारण एक निवेदन | सह पुस्तक भी उदाहरणोंसे भरी हुई होती तो अच्छा होता परन्तु में बहुत उदाहरण नहीं दे सका हूँ इसका कारण केवल मेरी अयोग्यता ही नहीं है, वरन्‌ स्थानका अभाव भी है में नीति-विज्ञानपर पूरा ग्रन्थ लिखने नहीं बैठा हूँ; और मुझमें इसकी क्षमता ही है। में केवल अपने देशबन्धुओंका ध्यान इस ओर आशक्ृष्ट करना चाहता हूँ | तौभी मैंने अपने सिद्धान्तोंके स्पष्ट करनेके लिए यथेष्ट उदाहरण दे दिये हैं मेंने केवल अपने देशसे ही उदाहरणोंको नहीं लिया है। अपने सिद्धान्तोंकी अच्छी तरह स्पष्ट करनेके निमित्त यदि मुझे अन्य देशोंसे भी उदाहरण प्राप्त हो सके हैं, तो उनके उद्धृत करनेमें भी में नहीं हिचका हूँ | कारण यह है कि देश काल और जातिके रहते भी एक सा्वेभोमिक मनुष्यजाति अवश्य

*[७, ७०, ] 99. 474-87.

१७४ नीते-विशज्ञान |

पवद्यमान है जो कुछ समयके बाद निःसन्देह सभी जातीय बंधनों, घ॒णा और स्वाथंपरताओंको छिन्न करके टेनिसनके कथनानुसार संसारके एकी- करण तथा समस्त मनुष्य जातिकी एक ही पालिमेण्टके सवरूपमें ( !7 पीर #ट्वेठाबाता णी 6 रैकलीव गाव ?ण"99०॥६ ०0 ता) व्यक्त होगी | दूसरा कारण भी है यदि प्रकृतिकी एकरूपता सत्य है तो मनुष्यका इतिहास भी एक ही होना चाहिए। कारणके एक रहनेपर प्रभाव भी एक ही होगा इसीलिए हमने विशेषकर मज़हबी अभिद्रोह ओर मज़हबी अत्याचारोंके सम्बन्ध योरोपसे ही उदाहरण लिये हैं | योरोपमें ही मज़हबका प्राबल्य प्रर्ण इढ़ताके साथ हुआ था। वहाँ ही मज़हबके वृक्षमं अनेकों विषमय फल लगे थे। इसीलिए योरोपमें ही हमें मजहबी अत्याचारोंके सर्वोत्तम उदाहरण प्राप्त होते हैं। परन्तु आज हमारे देशकी मज़हबी अवस्था ठीक वैसी ही है जो योरोपकी कुछ समय पहले थी | आँख खोलकर देखने ओर विचार करनेसे यह स्पष्ट हो जायगा कि हमारा वर्तमान मजहब योरोपके किस्तान धर्मसे मित्र नहीं है अतः मजहबके हाथों हम उतना ही सताये जा रहे हैं जितना पूर्वकालमें योरोप सताया जा चुका है, एवं आज भी कुछ कुछ सताया जा रहा है निस्तारके लिए हमें भी वही मार्ग पकडना होगा जिसे योरोपने पकड़ा हे दुःखसे छुटकारा पानेके लिए हमें भी ज्ञानका आश्रय लेना होगा योरोपके भीषण महा समरकोी ओर इशारा करके आज कछ हम संकीर्णता-प्रिय भारतवासी यह कह उठते हैं कि 32 “४ विज्ञानकी इतनी प्रशंसा व्यर्थ है। देखो इसने कु विशोध। -"रोपमें किस प्रकार शोणितकी सरिता बहाई है, किस प्रकार दुर्बों पर अत्याचार कराया है, किस

विषय-प्रवेश १५

प्रकार विज्ञानकी जानकारी मनुष्यके विनाशर्मे---असंख्यों मनुष्योंके वध करनेमें---लगाई गई है, ज्ञानका योरोपने बहुत दुरुपयोग किया है, प्राकृतिक ज्ञानने योरोपको नरहत्यामें बड़ी सहायता दी है, अतएव ज्ञनको परम लक्ष्य समझना चाहिए। पाश्चवय जातियाँ धन विभवके बढ़ानेके चक्करमें हैं| हम भारतवासियोंकों पश्चिमकी इस आधिभौतिक सम्यताकी आवश्यकता नहीं है।” आज कल तर्क करनेका यही फैशन है। पाश्चात्य सभ्यताको भौतिक और अपनी सभ्यताको आध्यात्मिक कह कर हम झट पाश्चवात्य जगतके विज्ञान और आविष्कारोंको विषवत्‌ त्याग करनेंके लिए तत्पर हो जाते हैं। परन्तु में पूछता हूँ कि वर्तमान वैज्ञानिक उन्नतिके पूवे क्‍या योरोपमें छड़ाइयोँ हुआ करती थीं मज़हबी योरोपमें अधिक लड़ाइयाँ हुई हैं या वैज्ञानिक योरोपमें ? पुनः वर्तमान योरोपीय युद्ध क्या यह वैज्ञानिकोंका--या योरोपके दाशैनि- कोंका--भड़काया हुआ है या मज़हबी लोगोंका ? क्या प्राय: प्रत्येक बद्ध-समर योरोपीय देशोंके गिरजोंसे लोगोंको युद्ध करनेकी उत्तेजना दी जाती थी ? और उनका वग्यैवद्धेन किया जाता था ? क्‍या विलियम केसर यह समझता था कि वह इसी लिए अवतरित हुआ है कि वह देशोंको विजय करे ? क्या इंग्हैण्ड प्रभति देशोंको पराजय करना वह अपना ईश्वर-निरूपित कतेव्य अनुमान करता था क्या जमैनीके प्रत्येक गिरजेसे जुझाऊ बाजोंसे भी आधेक उत्ते- जक प्रोत्साहनकी ध्वनि उठती थी ? क्या प्रत्येक देशके गिरजोंमें बिजय प्राप्तिके लिए इश्वरकी प्राथना की जाती थी ? यदि ज्ञान ही युद्धका कारण है तो संसारकी असमभ्य जातियोंमें युद्धका नाम और निशान भी पाया जाना चाहिए था--उनहींको पूर्ण अहिंसा- वादी होना चाहिए था। यदि सुखोपभोग--ऐहिक आनन्द और

१६ नीतिनपैज्ञान

आराम---ही लड़ाइयोंके जनक हैं तो आओ हम अपने भवभूति ओर कालिदासको तिलांजलि देकर जंगलियोंके सांग्रामिक गीत गायें. अपने न्याय और वेदान्तको छोड़कर नर-बलिदान आरम्म करें और चन्दन, अक्षत, पुष्प, मिथशन्न इत्यादिके बदले नररक्तसे ही अपने देव- ताओं तथा ईश्वरक़ो प्रसन्न करें| यदि भौतिक सम्यता बुरी बस्तु है तो आओ हम अपने वस््रोंकी अभी उतार फेकें और छाल और बल्कल धारण करें--पकाकर नाना प्रकारके उत्तम भोजनोंका खाना छोड़ दें और कच्चे कन्द मूल खाना तथा मांसभक्षण करना आरम्भ करें सुन्दर मकानोंकोी तोड़ डार्ले---ताजमहछकको अभी भस्मीभूत कर डालें---और पर्णकुटीमें रहना शुरू करें। यदि भौतिक सम्यता बुरी वस्तु है--सुखोपभोग विष है--तो आओ शीघ्र वीणाको चूल्हेमें लगा दें, इसराज और तानपूरेकों चूर चूर कर डालें। संसा- रके सभी पुस्तकाल्योंको अभी अप्निको समपेण कर डाले। इस तके- का पूर्ण उत्तर पाठकोंको इस पुस्तकमें कई स्थानों#पर मिलेगा। यहाँ उसके विस्तारकी आवश्यकता नहीं है

युद्धकी जड़ ज्ञानमें नहीं वरन्‌ मनुष्यके स्वभावमें है | मनुष्यने अपने प्रार्चीन दिख्लस्वभावको प्रणेताके साथ अभीतक परित्याग नहीं किया है--पशुताका अवशेष उसमें अभीतक विद्यमान है। इसलिए. समय समय पर वह अबतक भी ज्ञानका दुरुपयोग करता है। परन्तु इसलिए क्‍या हम ज्ञानके बदले अज्ञाको और सम्यताके बदले असमभ्यताको--ग्रहण करेंगे :

इस संसारमें दुरुपयोग किस वस्तुका नहीं होता ? भोजन करना मनुष्यके लिए कितना आवश्यक है ? क्या बिना भोजन किये मनुष्य

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* देखो अध्याय और १० !

विषय-प्रवेश १७

जीघित रह सकता है ? परन्तु ठीक तोर पर, ठीक रीतिसे और ठीक॑ परिमाणमें भोजन करनेसे ही मनुष्य कितनी बीमारियोंभें फैंस जाता है। तो क्या इसलिए हमें यही उचित है कि हम भोजन करना ही छोड़ दें ? भारतीय गवर्नमेण्टने लड़ाई दंगोंके बन्द करनेके खयालसे छोगोंस हथियार छीन लिये हैं; इसी तरह क्‍या गबनेमेण्टको यह भी नियम बना देना चाहिए कि कोई मनुष्य भोजन करे ही नहीं, क्योंकि अधिक भोजन करके अक्सर मनुष्य अजीर्ण और हैजेका शिकार बन जाता है मनुष्यके लिए. अग्नि कितनी अवश्यक वस्तु है; परन्तु मनुष्य इस अप्निका कितना दुरुपयोग करता है और इसके द्वारा अक्सर कितनी हानि होती है ? तो क्या इसलिए यही उचित है कि मनुष्य अग्निसे एकदम काम लेना ही छोड़ दे ? ( मनुष्यकी पद्युताकों ज्ञान ओर सहानुभूति ही कम कर सकती है, मजहब नहीं आगे चछ कर इसका पूरा प्रमाण मिलेगा कहा जा सकता हैं कि हमारे देशमें मज़हबी लछड़ाइयोंका नाम भी नहीं सुना जाता--हमारे धर्मको सत्य, ज्ञान और विज्ञानके राहमें खड़ा होते हुए नहीं पाया जाता। इसका कारण यह है कि प्रूषे समयमें हम मजहबी थे; परन्तु जबसे हमने मज़हबी होना शुरू किया तबसे निःसन्देह हमारे यहाँ भी योरोपके मज़हबी अग्निकुण्डमेंसे--जिसमें असंख्यों मनुष्योंका हवन किया गया धा--कुछ कुछ चिनगारियोँ उड़ उड़ कर आने ढछगी हैं। अन्य विश्वासका जबसे हमारे यहाँ साम्राज्य हुआ है उसी दिनसे हमने अत्या- चार आरम्म किया है। क्‍या हमारे यहाँ धार्मिक अत्याचार एकदम नहीं हैं ? निष्पक्ष होकर देखनेवाठा किस तरह अस्वीकार कर सकता है ? एक गोवधघके ही मसले पर क्या क्‍या नहीं हो जाता है! हमारी नीति०-२

भारत मे मज- हयी अत्याचार

१८ नीति-विज्ञान

राजनैतिक उन्नतिके पथको इसने किस प्रकार कण्टकाकीर्ण कर रकक्‍्खा है ! पुनः निराकारवाद और साकारवाद, हिंसावाद और अहिंसावाद, सनातनघर्म और आर््यसमाज प्रभृतिके झगड़े क्या कम गजब ढाते हैं ] हम अत्याचार करना अवश्य चाहते हैं परन्तु मौका नहीं मिलता।

और क्या भारतीय इतिहासमें धार्मिक अत्याचारोंके इशन्त एकदम नहीं मिलते ? हमारे यहाँ भी इन्क्वीजिशन ( 77१०ंअंध०॥ घामिक काचहरियाँ ) विद्यमान थीं। अशोकने एक धार्मिक पुलीस-विभाग स्थापित किया था जिसकी खुफ़िया पुलीस ( ५०४७००७ ) को सभी व्यक्तियों पर--सभी धर्मके, सभी सम्प्रदायके, सभी श्रेणीके मनुष्यों पर---अधिकार था छोगोंके आचरणको, और विशेष कर अहिंसाके सम्बन्धमं लोगोंके कार्य्यॉकी तहकौकात करना, तथा अपराधियोंको दण्ड दिलाना, यही इनका कतैव्य था। ब्लियोंके आचार-निर्रक्षणके लिए अलग गुप्तचर होते थे अशोककी उक्त ख़ुफ़िया पुलीसके बहुत कुछ अवोचीन नमूने भी मिलते हैं। सन्‌ १८७६ में काइमीरके सिंहासनको एक धानिक महाराजा सुशोभित करते थे। उनके राज्यमें शात््के नियमेको पालन करना जुर्म समझा जाता था, जिसकी जॉँचके लिए एक खास कचहरी थी ! इस पाँच पणिइत होते थे जो अपराधि- योंको उचित दण्ड दिया करते थे जाति-नियम भंग करनेवार्छको सज़ा देनेफे लिए उन्नीसवीं शताब्दीके मध्यतक---या शायद और बाद तक भी--खानदेश, दक्षिण और कॉकण इत्यादिभें पण्डितोंकी ऐसी “बहुतसी कचहरियाँ विद्यमान थीं। ये कहें। तक अनर्थ करती होंगी यह प्राठक स्त्रय॑ अनुमान कर सकते हैं | सातवीं शताब्दीमें हृषेवर्द्धन किसी जानवरके मारने ओर मांस-भक्षण करनेके अपराबमें प्राणदण्डकी सजा बड़ी खुशीके साथ देता था। अपराधीको कदापि क्षत्रा प्रदान

विषय-प्रवेश १९

नहीं किया जा संकेतों था। बारहवीं शताब्दीके अन्तर्मे गुजरातके राजा कुमारपाछको भी अहिंसाके प्रचारका असीम जोश चढ़ा था। एक चीलड़ मारनेके अपराधमें एक अभागे सोदागरकी अणहिलवाड़ाकी खास कचहरीमें जॉच हुई थी तथा उसका सब माल जब्त हुआ था। एक ओर मनुष्य राजधानीमें कचा मांस लानेके कारण फॉसीपर चढ़ाया

गया था ! #

+ इतिद्ासमें इस देशके ;थार्मिक अत्याचारोंके और भी अनेक उदाहरण मिल सकते हैं अभी थोड़े समय पहले महाराजा कालेज विजयानगरमके इतिद्वासाध्यापक श्रीयुत एम. एस. रामस्वामी आयेगर एम० ए० ने अगरेजीमें एक गवेषणा- पूर्ण लेख लिखा था जिसका कि अनुवाद 'जैनहितेषी' नामक मासिकपत्नमें ( भाग १५, अंक १-२ ) तामिल प्रदेशोंमें जेनधर्मावलम्बी शीर्षक देकर प्रका- दित किया गया है उसमें लिखा है कि “ईंसाकी सातवीं शताब्दिके मध्यमें (तिरुज्ञान संभाण्ड' नामक शैवाचार्यने कुनपाण्व्य नामक जैन राजाकों शेवमताव- लम्बी बनाया और उसे जनोंके विरुद्ध उत्तेजित किया फल यह हुआ कि उस समय जैनोंके प्रति ऐसी निष्ठुरता और निर्देयताका व्यवहार किया गया जैसा दक्षिणभारतके इतिहासमें कभी नहीं हुआ। संभाण्डके प्रणाजनक भजनोंसे--+जिनके प्रत्येक दसवें पदमें जैनधर्मकी निर्भत्सना की गई है---यह स्पष्ट है कि वेमनस्यकी मात्रा कितनी बढ़ी हुईं थी ।...दक्षिण भारतमें जेनियोंकी विनष्ट प्रतिमायें, परि- त्यक्त गुफायें ओर भम्न मन्दिर इस बातके स्मारक हैं कि प्राचीन कालमें जेनसमाजका बहा कितना विशाल विस्तार था और किस प्रकार ब्राह्मणोंकी धार्मिक स्पर्धाने उनको म्तप्राय कर दिया जेनसमाज विस्म्ृतिके पटलमें लुप्त हो! गया; उसके सिद्धान्तों पर गहरी चोट लगी; परन्तु दक्षिगर्मे जैनधर्म ओर वैदिक धर्मके मध्य जो कराल संग्राम और रक्तपात हुआ वह मदुरामें मीनाक्षीके मन्दिरके स्वर्ण-कुमुद सरोवरके मण्डपको दीवारोंपर अंकित चित्रोंको देखनेसे अब भी स्मरण हो आता हैं। इन चित्रोंमें जैनियोंके विकराल शत्रु तिशज्ञान संभाण्डके द्वारा जैनियोंकि प्रति किये गये अत्याचारों और रोमावकारी यातनाओंका चित्रण है। इस कझुणा- काण्डका यहीं अन्त नही होता है, मदुरा-मन्दिरके बारह वार्षिक त्योहारोंमेंसे'

पॉचमें यह हृदयविदारक दृश्य अब भी प्रतिवर्ष दिखलाया जाता है !... -प्रकाशक

२० नीति-घिज्ञान

अब मुझे इस ग्रन्थकेः सम्बन्धमें केवल एक बात और कहनेकी आवश्यकता है इस मग्रन्थके पढ़नेपर पाठकवर्ग संसारके आदि .यट्‌ यह कहेंगे कि इसमें मज़हबकी जरा कड़ी आलो- युगांम मजह- हि कं मे देष रखनेके बसे उपकार। '*ों की गई है। परन्तु मजहबसे द्वेष रखनेके कारण

मैंने ऐसा नहीं किया है वरन्‌ इसमें जो कुछ लिखा

गया है वह केवल सत्य-जिज्ञासाकी प्रेरणासे | संसारकी उन्नतिमें मज़- हबने जो भाग लिया है उसे में मुक्तकण्ठसे स्वीकार करता हूँ नर-विज्ञान ( ॥70४०४००९४० ) के विद्यार्थयोंसि यह बात छिपी नहीं है कि मजहब ही सभी रीति-नीति रस्म-रिवाज, नियम और कानूनोंका जनक है। मज़हबहांके द्वाग सारी शासन-प्रणालियोंकी उत्पत्ति हुई है। यदि प्राचीन असभ्य समयके सरदारके चारों ओर मज़हब जनित आभा<